बद्रीनाथ धाम से जुड़ी सारी जानकारी | Badrinath Kaise Jaye

जय श्री राम मित्रों ! जैसा की आप जानते हैं कि हिन्दू धर्म के चार धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री है। सनातन धर्म में चार धाम तीर्थ यात्रा का बहुत महत्व है। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु इन धामों की यात्रा करते हैं। इन्हीं चार धामों में से एक प्रसिद्ध धाम है बद्रीनाथ। बद्रीनाथ मंदिर जिसे बद्रीनारायण के नाम से भी पुकारा जाता है, एक प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिर है। बद्रीनारायण धाम श्री हरि भगवान विष्णु को समर्पित है। आज के लेख में हम बद्रीनाथ थाम से जुड़ी सभी जानकारी से आपको रूबरू करवायेंगे। आज की पोस्ट में आप जान पायंगे कि बद्रीनाथ यात्रा कैसे करे, बद्रीनाथ कैसे पहुंचे, हरिद्वार से बद्रीनाथ की दूरी, केदारनाथ से बद्रीनाथ कैसे जाएं, बद्रीनाथ कब जाना चाहिए, बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास, कैसे करें बद्रीनाथ में दर्शन, आदि.

मान्यताओं के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर में होते हैं भगवान विष्णु के बद्रीनाथ स्वरूप के दर्शन, तो आइये जानते हैं बद्रीनाथ धाम से जुड़ी सारी जानकारी.

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बद्रीनाथ मंदिर कहां है | ऋषिकेश से बद्रीनाथ की दूरी | जोशीमठ से बद्रीनाथ की दूरी

बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। अलकनंदा नदी के बाएं तरफ नर और नारायण नाम की दो पर्वत मालाएं है। यह मंदिर इन दोनों पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है। यह मंदिर समुद तट से करीब 3100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसके आसपास बने शहर को बद्रीनाथ के नाम से पुकारा जाता है। मंदिर के सामने नीलकंठ चोटी स्थित है। ऋषिकेश से यह मंदिर करीब 214 किमी की दूरी पर है जबकि जोशीमठ से करीब 45 किमी दूर है। जोशीमठ इस मंदिर का बेस कैम्प भी है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप की पूजा की जाती है। इस मंदिर का नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा इसके बारे में हम आगे लेख में आपको बताएंगे।

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बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास | बद्रीनाथ की कहानी | Badrinath ka Itihas

यह मंदिर कितना पुराना है। इसको लेकर कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यह मंदिर वैदिक काल का है जो लगभग 1500 ईसा पूर्व से बनना शुरू हुआ था। हालांकि इस मंदिर के 7वीं और 9वीं सदी में स्थापित होने के प्रमाण मिलते हैं। इसके अनुसार 9वीं शताब्दी में एक भारतीय संत आदि गुरू शंकराचार्या ने 814 से 820 ई तक इस मंदिर का निर्माण किया था। उन्होंने दक्षिण भारत के केरल राज्य के नंदगिरी ब्राहमण को इस मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया। तब से लेकर आज तक यह परंपरा अनवरत जारी है। आज भी यहां का पुजारी दक्षिण भारत से ही होता है।

कैसे पड़ा बद्रीनाथ नाम | Badrinath Dham Mythological Stories

जैसा कि आपने ऊपर के लेख में जाना कि बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप् की आराधना की जाती है। इसका नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा, इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार की बात है जगत के पालनहार श्री हरि भगवान विष्णु गहन तपस्या में लीन थे। जिस जगह वह तपस्या कर रहे थे उसी समय वहां बहुत अधिक बर्फ गिरने लगी। भगवान विष्णु हिमपात से पूरी तरह ढ़क गये। भगवान विष्णु को इस तरह देखकर माता लक्ष्मी परेशान हो गई और उन्होंने भगवान विष्णु के ऊपर बर्फ न पड़े इसके लिए भगवान विष्णु के पास खड़े होकर एक बेर (बदरी) वृक्ष का रूप धारण कर लिया। सारी बर्फ इस वृक्ष पर ही पड़ने लगी। माता लक्ष्मी श्री विष्णु को मौसम की सारे परेशानियों धूप, वर्षा, हिमपात को अपने ऊपर सहन करने लगी और उनके साथ ही तपस्या करने लगीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपनी तपस्या पूरी की तो उन्होंने देखा कि माता लक्ष्मी तो पूरी तरह बर्फ से ढक गई थी। भगवान विष्णु माता ने लक्ष्मी की तपस्या को देखकर उन्हें वरदान दिया कि तुमने मेरे समान ही तप किया है इसलिए इस धाम में मेरी और तुम्हारी पूजा एक साथ होगी। तुमने मेरी रक्षा बदरी के पेड़ से की। इसलिए आज से इस धाम को बबद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा।

कैसा है मंदिर का स्वरूप | Bhagwan Badrinath Ka Mandir Kaisa Hai

बद्रीनाथ मंदिर मुख्य रूप से तीन भागों में बंटा है, गर्भगृह, दर्शनमण्डल और सभामण्डप। बद्रीनाथ धाम को धरती के बैकुंठ के नाम से भी पुकारा जाता है। मंदिर में 15 मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में सबसे प्रमुख श्री हरि भगवान विष्णु की एक मीटर ऊची प्रतिमा है। यह प्रतिमा काले शालिग्राम पत्थर की बनी हुई है। इसमें भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में बेठे है। विष्णु जी के दाहिने तरफ कुबेर, लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां सुशोभित है। ऐसी मान्यता है कि भक्त जिस रूप में भगवान विष्णु की प्रतिमा देखना चाहते हैं उसे वह उसी रूप में दिखाई देती है। ब्रहमा, विष्णु, महेश आदि के दर्शन इस मूर्ति में परिलक्षित होते हैं। बद्रीनाथ में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है। एक चबूतरा नुमा जगह है जिसे ब्रहम कपाल के नाम से पुकारा जाता है। इस जगह पर लोग अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण करते है। ऐसी मान्यता है कि यहां पितरों का तर्पण करने से उनको मुक्ति मिल जाती है। इससे जुड़ी एक और मान्यता है कि ब्रहम कपाल पर श्री हरि भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने कठोर तपस्या की। इन तपस्या के चलते उनको अगले जन्म में देवता के रूप में जन्म लेने का आर्शीवाद मिला। नर अगले जन्म में अर्जुन रूप में पैदा हुए तो वहीं नारायण का श्रीकृष्ण के रूप में जन्म हुआ।

यहां पर भगवान विष्णु के पैरो के निशान भी है इन निशानों को चरण पादुका कहा जाता है। बद्रीनाथ मंदिर से देखने पर बर्फ की चादर में ढका एक ऊँचां शिखर पर्वत भी दिखाई देता है इसे गढ़वाल क्वीन के नाम से पुकारा जाता है।

इस मंदिर में अखंड दीपक जलता रहता है। जिस जगह पर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी वह स्थल तप्त कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। आश्चर्यजनक रूप से इस कुण्ड में का पानी बारहों महीने गर्म रहता है। बद्रीनाथ मंदिर छह महीने खुला रहता है और छह महीने बंद रहता है। कपाट खुलने और बंद होने के समय रावल साड़ी पहन कर माता पार्वती का श्रृंगार करके ही गर्भगृह में प्रवेश किया जाता है।

इस मंदिर में शंख बजाने की पाबंदी है। इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही हैं। धार्मिक कथा के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी बद्रीनाथ थाम में तुलसी रूप में ध्यान कर रही थी। शंखचूर्ण नाम के राक्षस से समस्त देवतागण परेशान थे। तब भगवान विष्णु ने शंखचूर्ण का वध कर दिया। वध करने के बाद भगवान विष्णु ने शंख नहीं बजाया क्योंकि उनके शंख बजाने से माता लक्ष्मी का ध्यान भंग हो जाता। वहीं मान्यता आज भी चली आ रही है और इसके चलते ही बद्रनाथ मंदिर में शंख नहीं बजाया कि माता लक्ष्मी का ध्यान ना भंग हो जाये।

वैज्ञानिक कारण यह है कि शंख बजाने से प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है। बद्रीनाथ में बर्फ गिरती है। शंख की आवाज से तूफान आने या चट्टान खिसकने का खतरा होता है। इसीलिए बद्रनाथ में शंख नहीं बजाया जाता।

आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इस धाम में जो आरती गाई जाती है उसे बदरूद्दीन नाम के मुस्लिम व्यक्ति ने आज से करीब 152 वर्ष लिखा था। मंदिर में चने की कच्ची दाल, गरी का गोला, मिश्री और वनतुलसी की माला का प्रसाद चढ़ता है।

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बद्रीनाथ मंदिर कब जाएं | बद्रीनाथ यात्रा कब करे | बद्रीनाथ कब जाना चाहिए

उत्तराखंड की बर्फीलों वादियों में स्थापित होने के चलते बद्रीनाथ में साल भर ठंड बनी रहती है। सदियों में बर्फबारी के चलते यहां भयंकर ठंड होती है यहां का तापमान माइनस से भी नीचे चला जाता है जिससे यात्रा करने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए सर्दी में यहां नहीं जाना चाहिए। गर्मी के मौसम में यहां की यात्रा का सबसे उत्तम समय होता है। यह मंदिर छह महीने खुलता है और छह महीने बंद रहता है। बसंत पंचमी पर इस मंदिर के खुलने की तारीख का ऐलान होता है। जबकि विजय दशमी पर मंदिर के कपाट बंद करने की तारीख की घोषणा होती है। आम तौर पर अक्टूबर-नवंबर में कपाट बंद हो जाते हैं क्योंकि उस समय ठंड शुरू हो जाती है। इस वर्ष 2023 में मंदिर के कपाट 27 अप्रैल को सुबह 7 बजे भक्तों के दर्शनार्थ खुल जाएंगे। मंदिर सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है। श्रद्धालु सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक भगवान विष्णु के बद्रीनाथ रूप के दर्शन कर सकते है। आप जिस भी मौसम में यहां की यात्रा करें, अपने साथ गर्म कपड़े जरूर रखें।

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बद्रीनाथ मंदिर कैसे जाएं | बद्रीनाथ जाने का रास्ता | Badrinath Jane Ka Rasta

देश के कई बड़े शहरों से बद्रीनाथ के लिए फ्लाइट, ट्रेन और बस सेवा उपलब्ध है। अगर आप फ्लाइट से बद्रीनाथ जाना चाहते हैं तो आपको देहरादून के जाॅली ग्रांट हवाई अड्डे पर उतरना होगा। यह हवाई अड्डा दिल्ली, मुंबई, बैंगलौर, चेन्नई, अहमदाबाद और जयपुर जैसे बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। इन सभी शहरों से यहां के लिए सीधी फ्लाइट सेवा उपलब्ध है। इस हवाई अड्डे से बद्रीनाथ थाम की दूरी करीब-करीब 305 किमी है। हवाई अड्डे पर उतरकर आप यहां से ट्रैक्सी कर ले जो सीधे आपको बद्रीनाथ पर उतार देगी।

रेल से ऐसे जाएं बद्रीनाथ | हरिद्वार से बद्रीनाथ की दूरी | Haridwar to Badrinath Distance

अगर आप ट्रेन से बद्रीनाथ जाना चाहते हैं तो आपको हरिद्वार या देहरादून रेलवे स्टेशन पर उतरना होगा। हैं। हरिद्वार से बद्रीनाथ की दूरी 317 किमी है, वही देहरादून से यह दूरी करीब 328 किमी बैठती है। यह दोनों स्टेशन लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, जैसे कई बड़े स्टेशनों से जुड़े हुए है। अगर आपके शहर से ऋषिकेश के लिए कोई ट्रेन मिलती है तो आप सीधे वहां की ट्रेन भी पकड़ सकते है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की दूरी करीब 295 किमी है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिए टैक्सी और बस सेवा उपलब्ध है। यहां पर मैं आपको यह सुझाव देना चाहूंगा कि अगर आपके शहर से देहरादून और हरिद्वार दोनों के लिए ट्रेन उपलब्ध है तो आप देहरादून ना जाकर हरिद्वार जायें। ऐसी सलाह मैं आपको इसलिए दे रहा हूं कि हरिद्वार से बद्रीनाथ के लिए सीधे बस सेवा उपलब्ध है।

बस द्वारा ऐसे जाएं बद्रीनाथ | Haridwar to Badrinath Bus | Badrinath Ki Yatra

अगर आप बस से बद्रीनाथ जाना चाहते हैं तो आपको देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश इन तीनों शहरों में बस द्वारा जा सकते हैं। दिल्ली, लखनऊ जैसे बड़े शहरों से यहां के लिए सीधी बस मिलती है। जहां से आप आसानी से प्राइवेट टैक्सी पकड़कर बद्रीनाथ पहुंच सकते है। जैसा कि मैने ऊपर आपको बताया कि अगर आप आपके शहर से इन तीनों जगहों के लिए बसें है तो आप हरिद्वार के लिए बस पकड़े क्योंकि हरिद्वार से बद्रीनाथ के लिए सीधी बस मिलती है। अंततः बद्रीनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको सड़क मार्ग का विकल्प ही चुनना होगा क्योंकि बद्रीनाथ मंदिर के आसपास कोई भी रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट नहीं है। ऐसे में हरिद्वार से ही बद्रीनाथ के लिए बस पकड़नी पड़ेगी। हां अगर आप टैक्सी से बद्रीनाथ जाना चाहते हैं तो देहरादून व ऋषिकेश दोनों जगहों से आपको बद्रीनाथ जाने के लिए टैक्सी मिल जायेगी। उस स्थिति में आपको हरिद्वार जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।

अगर आप अपनी गाड़ी से बद्रीनाथ जाना चाहते है तों इसमें बहुत बड़ा रिस्क है क्योंकि बद्रीनाथ में एक ऐसी सड़कों पर आप गाड़ी चलायेंगे जहां एक तरफ पहाड़ है और दूसरी तरफ खाई। ऐसे में आपकी जरा सी गलती आपके लिए जानलेवा साबित हो सकती है। हां अगर आपने इस तरह की सड़कों पर गाड़ी चलाई हो तो आप जरूर अपनी गाड़ी से आये। अन्यथा ऐसे ड्राइवर को अपनी गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी सौंपे जिसने इस तरह की सड़को पर गाड़ी चलाई हो। मंदिर से 300-400 मीटर पहले गाड़ी पार्क करा दी जाती है। वहां से पैदल चलकर आप बद्रीनाथ पहुंच सकते हैं। वैसे मेरी आपको एक व्यक्तिगत सलाह है कि बद्रीनाथ के लिए रेल, बस या फ्लाइट सुविधा का ही उपयोग करें। ऐसे मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि बद्रीनाथ में हिमपात होता है और ऐसी रोड़ पर गाड़ी चलाना कोई आसान काम नहीं है।

हरिद्वार से बद्रीनाथ का कितना है किराया | Haridwar to Badrinath | Badrinath Yatra Kiraya

सबसे पहले ट्रेन या बस द्वारा हरिद्वार पहुंचे। उसके बाद हरिद्वार से बद्रीनाथ के लिए बस पकड़े। हरिद्वार से सरकारी और निजी कई तरह की बसे बद्रीनाथ के लिए जाती है। अगर आप सुबह हरिद्वार पहुंच जाते है तो पहुंचने के साथ ही सुबह की कोई भी बस में बुकिंग करा ले क्योंकि सुबह के समय बद्रीनाथ की बसों में काफी भीड़ होती है। हरिद्वार से सरकारी बस का किराया 500 से 600 रू0 के बीच है, वहीं प्राइवेट बसों में जाने के लिए आपको जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगा। इनका किराया करीब 1000 रू0 तक है। अगर आप किसी ऐप से आॅनलाइन बस बुक करते हैं तो इस पर आपको 100 से 200 रू0 ज्यादा चुकाने पड़ेगे लेकिन इसका एक फायदा है कि इससे आपको अपनी मर्जी की सीट जरूर मिल जायेगी। हरिद्वार से बद्रीनाथ पहुंचने में करीब 10 घंटे लगते हैं। अगर आपको बद्रीनाथ के लिए बस ना मिले तो आप जोशीमठ की बस पकड़ ले। जोशीमठ से बद्रीनाथ बहुत पास है।

बद्रीनाथ में कहां ठहरे | Badrinath Ashram | Hotel in Badrinath | Best Time to Visit Badrinath

बद्रीनाथ में कई सारे आश्रम मौजूद है जहां आप मात्र 200 से 300 रूपये खर्च कर रूक सकते हैं। इसके अलावा यहां जीएमवीएम द्वारा बनाया गया यात्री निवास भी है जिसका किराया करीब 300 रू0 है लेकिन यहां पर आपको अन्य सुविधाएं नहीं मिलेगी। यहां पर डीलक्स और सेमी डीलक्स होटल भी उपलब्ध है जिनका किराया 4000 से 5000 रू0 है। इस किराये में आपका नाश्ता, लंच और डिनर शामिल है। आप ऑनलाइन इन होटलों में बुकिंग कर सकते है ताकि पीक सीजन में आपको कोई परेशानी न हो। यहां का पीक सीजन अप्रैल से मई तक होता है। इस सीजन में भारी भीड़ बद्रीनाथ आती है। ऐसे में इस सीजन में होटल मिलने में दिक्कत होती है। इसलिए आप बद्रीनाथ जाने से पहले ही ऑनलाइन होटल बुक कर लें। अक्टूबर से नवंबर का महीना बद्रीनाथ की यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है क्योंकि इस समय भीड़ भी कम होती है और 800 से 1500 रू0 में होटल भी मिल जाते है। हां इस समय आपको ठंड का जरूर सामना करना पड़ेगा क्योंकि यहां पर हिमपात होता है और तापमान माइनस से भी नीचे चला जाता है।

अगर आप यहां महंगे होटलों में ठहरते हैं तो उनके किराये पैकज में ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर शामिल है। अगर आप किसी आश्रम में ठहरते है तो भी यहां पर लंगर चलता है जहां पर जाकर आप खाना खा सकते हैं। किसी होटल में 100 से 150 रू0 में खाने का थाल भी आपको मिल जायेगा।

इस तरह करें बद्रीनाथ में दर्शन | Badrinath Temple Darshan | बद्रीनाथ मन्दिर के टिकट

बद्रीनाथ जाने के लिए आपको ई-पास की जरूरत पड़ती है। आप मंदिर कमेटी की आफीशियल वेबसाइट पर जाकर यहां जाने के लिए अपना पंजीकरण करा सकते है। बद्रीनाथ मंदिर पहुंचने पर एक तप्त कुंड में स्नान करिये जिसका पानी बारह महीने गर्म रहता है। नहाने के बाद आप मंदिर के अंदर जाने के लिए लाइन में लग जाये। अगर आप पीक साइन में बद्रीनाथ गये तो आपको भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए 4-5 घंटे लाइन में लगे रहने होगा लेकिन अगर आप अक्टूबर-नवंबर के महीने में बद्रीनाथ जाते हैं तो आप मुश्किल से 1 से डेढ़ घण्टे में मंदिर के अंदर पहुंच जाएंगे। वहां भगवान बद्रीनाथ की विशाल प्रतिमा मौजूद है। उसके दर्शन करिये और अपनी मनोकामना उनके सम्मुख रखिए। कहते हैं कि इस दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता। यहां आने पर लोगों के पाप धुल जाते है। इसके बाद आप ब्रहम कपाल जाइये। यह वही जह है जहां पर लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण करते हैं और उनके निर्मित दान इत्यादि करते हैं।

बद्रीनाथ के आसपास क्या देखें |

अगर आप बद्रीनाथ आये तो यहां पर आसपास कई दर्शनीय स्थल है जहां पर आपको जरूर जाना चाहिए। बद्रीनाथ से एक किमी दूर माणा गांव है। माणा गांव में आप व्यास गुफा और गणेश गणेश गुफा के दर्शन जरूर करिए। यहीं पर सरस्वती माता का एक मंदिर भी है वहां जाकर माता सरस्वती से आर्शीवाद लीजिए। यहीं पर एक शिला भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि जब पांडव स्वर्ग जा रहे थे तो भीम ने शिला डालकर पुल बना दिया था। आप उस शिला के दर्शन भी कर सकते है। इन सब जगहों को आप एक से दो घंटे में घूम सकते है।

बद्रीनाथ भगवान श्री हरि विष्णु का धाम है। इस मंदिर के बारे में एक कहावत मशहूर है-

‘जो जाऐ बद्री, वो ना आये ओदरी’’

इस कहावत का मतलब है कि जो भी व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन करता है उसे वापस माता के गर्भ में नहीं जाना पड़ता। मतलब जो एक बाद बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो भी श्रद्धालु बद्रीनाथ के दर पर सच्चे मन से मनौती करता है उस पर भगवान बदरी अपनी कृपा बरसाते है और श्रद्धालु की इच्छा अवश्य पूर्ण होती है। तो दोस्तों है यह थी भारत के चार थामों में से एक बद्रीनाथ मंदिर की सम्पूर्ण जानकारी। उम्मीद करते है बद्रीनाथ मंदिर के बारे में जानकर आप भी यहां जाने का प्लान अवश्य बनायेंगे। इस लेख को अपने दोस्तों, परिजनों के साथ साझा अवश्य करें जिससे भारत के मंदिरों के बारे में जानकारी सब तक पहुंचे। ऐसे ही धार्मिक और आध्यात्मिक लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे।

जयश्रीराम

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