द्विजप्रिय संकष्टी पर इस तरह करें आदि देव गणेश जी की पूजा | Dwijapriya Sankashti Chaturthi

फाल्गुन मास की शुरूआत 06 फरवरी से हो रही है। इस महीने द्विजप्रिय संकटी चतुर्थी, महाशिवरात्रि, सोमवती अमावस्या, होली जैसे बड़े त्योहार पड़ते हैं। फाल्गुन मास का पहला व्रत संकष्टी चतुर्थी का है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। मान्यता के अनुसार गौरी पुत्र भगवान गणेश के चार सिर और चार भुजाएं हैं। भगवान गणेश के इस स्वरूप की आराधना करने से सभी कष्टों का निवारण होता है और स्वस्थ जीवन के साथ सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। निःसंतान दंपत्तियां अगर इस व्रत को रखते हैं तो गणपति देव के आर्शीवाद से संतान सुख की प्राप्ति होती है। ऐसे में संतान प्राप्ति के इच्छुक दंपत्तियों के लिए यह व्रत काफी महत्व रखता है।

जो भी जातक पूरे विधिविधान से गणेश जी की पूजा करता है उससे गणपति देव प्रसन्न होते है और जातक के सारे दुखों को दूर कर उसके संकटों को हर लेते हैं। आज के लेख में हम जानेंगे कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कब है, किस तरह इस दिन पूजा पाठ करें, इसके महत्व आदि पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कब है | Dwijapriya Sankashti Chaturthi Kab Hai

द्विजप्रिय संकष्टी दिनांक 09 फरवरी, 2023 दिन गुरूवार को प्रात 06ः23 मिनट से प्रारम्भ होगी और 10 फरवरी दिन शुक्रवार को सुबह 07ः58 पर समाप्त होगी। हिन्दू धर्म में हर व्रत का मान उदया तिथि के अनुसार किया जाता है लेकिन संकष्टी चतुथी के व्रत का पारण चंद्रमा को अघ्र्य देकर किया जाता है। ऐसे में द्विजप्रिय संकष्टी चतुथी का व्रत 09 फरवरी, दिन गुरूवार को करना ही श्रेयस्कर होगा। द्विजप्रिय संकष्टी पर चंद्रोदय का समय 9 फरवरी 2023 को रात्रि 8 बजकर 32 मिनट है। इस दिन चंद्रमा की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त रात्रि 09 बजकर 25 मिनट है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत बिना चांद को अघ्र्य दिये सम्पूर्ण नहीं होता है। इस बार द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर सुकर्मा योग भी पड़ रहा है। सुकर्मा योग 08 फरवरी 2023, दिन बुधवार को शाम 04.31 पर शुरू होकर 09 फरवरी 2023, शाम 04 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। सुकर्मा योग पूजा पाठ के लिए बहुत उत्तम योग माना जाता है।

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इस तरह करें द्विजप्रिय संकष्टी पर पूजा | Dwijapriya Sankashti Pooja Vidhi

द्विजप्रिय संकष्टी वाले दिन सबसे वहले ब्रहम मुहूर्त में उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद अपने नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते पवित्र नदियों का ध्यान करें। स्नान के बाद साफ-धुले हुए वस्त्र पहन ले। चूंकि द्विजप्रिय संकष्टी गुरूवार को पड़ रही है इसलिए गणेश जी की पूजा के दौरान पीले रंग के वस्त्र धारण करें। अपने मंदिर की साफ-सफाई कर लें और मंदिर में भगवान गणेश के समक्ष बैठकर व्रत का संकल्प लें। एक साफ चैकी ले उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछा दे, उस चैकी पर गणेश जी की छोटी सी प्रतिमा को रख दे। गणेश जी को पीले रंग के फूल और माला अर्पित करें क्योंकि गणेश जी को पीला रंग अत्यन्त प्रिय है। धूप, दीप, दिखाएं। गणेश जी को चंदन का तिलक लगाएं और इस तिलक को आर्शीवाद स्वरूप अपने माथे पर लगाये। षोडशोपचार का पाठ करें। गणपति बप्पा को दुर्वा अर्पित करे। ध्यान रहे दुर्वा 11, 21, या 31 के क्रम में हो। हमेशा साफ-सुथरी दुर्वा ही गणेश जी को अर्पित करनी चाहिए। इसलिए किसी मन्दिर के प्रांगण से ही दुर्वा तोड़कर लाये और उन्हें आदि देव गणेश जी को भेंट करें। द्विजप्रिय संकष्टी की व्रत कथा पढ़े। अन्त में गणेश जी की आरती करें। गणेश जी को मोदक अत्यन्त प्रिय है इसलिए उन्हें भोग में मोदक जरूर चढ़ाएं। गौरी पुत्र गणेश जी की पूजा के बाद रात्रि में शुभ मुहूर्त में चंद्रमा को अघ्र्य दे। अगर संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा की पूजा और उसको अघ्र्य ना दिया जाये तो द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूर्ण नहीं होता है। कहते है कि चंद्रदेव की आराधना करने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है और चंद्र दोष दूर होता है। साथ ही व्यक्ति शारीरिक व मानसिक तनाव से मुक्ति पाता है क्योंकि चंद्रमा को मन का कारक कहा जाता है। पुराणों में वर्णित है कि चंद्रमा की पूजा को लेकर गणेश जी ने चंद्रमा को यह वरदान दिया था। संकष्टी चतुर्थी व्रत के पुण्य और गणेश जी के आशीर्वाद से संकट दूर होते हैं, धन-धान्य में वृद्धि होती है और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है.

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा | Dwijapriya Sankashti Story | Dwijapriya Sankashti Vrat Katha

द्विजप्रिय संकष्टी की एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक समय की बात है सभी देवी-देवताओं पर गंभीर संकट आन पड़ा। वे इस संकट के निवारण के लिए भगवान शिव शंकर भोलेनाथ के पास गए और उनसे मदद मांगी। वहां पर गणेश और कार्तिकेय जी भी उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि वे इस संकट को दूर कर सकते हैं और इसका समाधान उनके पास है। उनकी यह बात सुन शंकर जी अचरज में पड़ गये कि आखिर किसको वह देवताओं की समस्या का समाधान करने का कार्य सौंपे। तब उन्हें एक उपाय सौंपा। उन्होंने कार्तिकेय और गणेश जी से कहा कि जो भी पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले उनके पास आयेगा। उसे ही देवताओं के संकट का समाधान निकालने का दायित्व दिया जायेगा। भगवान शिव की यह बात सुनकर कार्तिकेय जी अपने वाहन पर सपार होकर पृथ्वी की परिक्रमा को निकल पड़े। गणेश जी ने अपने बुद्धि का उपयोग करते हुए अपने पिता भगवान शिव और माता पार्वती की ही 7 बार परिक्रमा कर डाली। जब कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस लौटे तो उन्होंने गणेश जी को भगवान शिव के सम्मुख बैठा हुआ देखा। यह देखकर वह गर्वित हो गए और अपने आप को विजेता समझने लगे। भगवान शिव ने गणेश जी से पूछा कि आखिर तुमने पृथ्वी की परिक्रमा क्यों नहीं की। गणेश जी ने उत्तर दिया कि मां-बाप के चरणों में पूरा लोक है। इसी कारण मैने आप दोनों की परिक्रमा की। गणेश जी की यह बात सुनकर भोलेनाथ और माता पार्वती अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं के संकट को दूर करने की जिम्मेदारी गणेश जी को सौंप दी। भगवान शिव ने गणेश जी को आर्शीवाद भी दिया जो भी जातक चतुर्थी के दिन विधिवत तुम्हारी पूजा करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अघ्र्य देगा। उसके सारे संकट क्षण भर कट जाएंगे।

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द्विजप्रिय संकष्टी महत्व | Dwijapriya Sankashti Ka Mahatva

संकष्टी चतुर्थी का मतलब होता है संकट को हरने वाली चतुर्थी। संकष्टी संस्कृत भाषा से लिया गया एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है कठिन समय से मुक्ति पाना। इस दिन व्यक्ति अपने दुःखों से छुटकारा पाने के लिए गणपति की अराधना करता है। द्विजप्रिय संकष्टी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण तिथि होती है। इस तिथि की महत्ता इसी बात से परिलक्षित होती है कि इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेशजी के स्मरण करने मात्र से मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाते है। सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा जी ने संकष्टी चतुर्थी व्रत की महत्ता को बताते हुए कहा कि जो भी जातक सच्ची श्रद्धा और भक्ति से आज के गणपति जी की पूजा-उपासना करता है उस साधक के सभी दुःख, दर्द और क्लेश दूर हो जाते हैं। साथ ही व्यक्ति के जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है।

भगवान गणेश के 32 रूप है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के इन्हीं रूपों में से उनके छठे स्वरूप की पूजा-आराधना की जाती है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने वाले साधक को अपने जीवन में अपार धन, सुख, कैरियर में उन्नति व व्यापार में वृद्धि की प्राप्ति होती है। चंद्र दोष का अंत होता है। आज के दिन दूब, सुपारी और फूल से गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है।

द्विजप्रिय संकष्टी का व्रत सूर्योदय से प्रारम्भ होकर व्रत का पारण चंद्र दर्शन के बाद किया जाता है। आज के दिन विधिवत संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने और पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और उत्तम स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है।
ज्योतिष अनुसार इस दिन दान करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन गरीबों और जरुरतमंदों को वस्त्र, भोजन, अनाज आदि का दान करने से घर में बरकत बढ़ती है।

द्विजप्रिय संकष्टी के उपाय | Dwijapriya Sankashti Upay

द्विजप्रिय संकष्टी के कुछ विशेष उपाय है जिन्हें अपनाकर आप भगवान गणेश की कृपा से अपने जीवन की सारी परेशानियों से छुटकारा पा सकते हैं।

गणपति जी की पूजा में दुर्वा चढ़ाने का नियम है। आज के दिन आप गणपति बप्पा को दुर्वा की 11 गांठें अर्पित करें और इसके बाद ‘ऊँ श्रीम गम सौभाग्यः गणपतये वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नमः॥’’ मंत्र का तुलसी की माला से 108 बार जप करें। ऐसा करने से आपके सुख-सौभाग्य में वृद्धि होगी। आर्थिक समस्या का कभी भी सामना नहीं करना पड़ेगा। घर में धन-धान्य के भंडार भरे रहेंगे। अगर परिवार में कोई जमीन जायदाद का विवाद हो तो उसका भी समाधान होगा। गणेश जी का एक और मंत्र है मंत्र- ‘ऊँ श्री ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः‘ की 11 माला का जप करने से कभी भी पैसे की तंगी नहीं होगी।

संकष्टी चतुर्थी वाले दिन गणेश जी के 12 नाम सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन का जप करना बहुत ही सुखदायक होता है। इसके अलावा उनके मंत्र ‘ऊँ गणपते नमः’ ‘गं गणपते नमः’ मंत्रों का जाप करते हुए उन्हें लाल फूल, चंदन अवश्य चढ़ाएं। गणेश जी की प्रतिमा के साथ शिव परिवार की प्रतिमा भी स्थापित करें। ‘ऊँ नमोः शिवाय’ मंत्र का उच्चारण करते हुए शिव प्रतिमा स्थापित करें और उसका विधिवत पूजन करें। ऐसा करने से से आपके शत्रु परास्त होंगे और आपको हर कार्य में सफलता हासिल होगी। इसके अलावा अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति के लिए आज के दिन धनदाता गणेश स्तोत्र का पाठ करें।

उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए द्विजप्रिय संकष्टी के दिन गणेश जी को सुपारी अर्पित करें। इस उपाय को करने से आपका स्वास्थ्य बेहतर होगा और शरीर निरोगी बना रहेगा।

गणपति देव की पूजा के समय उनको गेंदे के फूल चढ़ाएं तथा गुण का भोग लगाएं। इस उपाय को करने से आपके सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होगे।

सुखी वैवाहिक जीवन के लिए गणेश जी को सिंदूर अर्पित करें। तत्पश्चात उसका तिलक अपने मस्तक पर लगाएं। मान्यता है कि गणेश जी को सिंदूर अत्यन्त प्रिय है। इसके अलावा सिंदूर को सुख-सौभाग्य के रूप में भी माना जाता है। अगर आप संकष्टी चतुर्थी के दिन इस उपाय को करते हैं तो आपका वैवाहिक जीवन सुखमय बीतेगा और कभी भी कोई अड़चन का सामना नहीं करना पड़ेगा।

संकष्टी चतुर्थी वाले दिन शमी के पेड़ का पूजन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से आदि देव गणेश अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। अगर आप शमी के पत्तों को भगवान गणेश को चढ़ाते तो आपके घर से दुख, दरिद्रता का नाश होगा। नकारात्मक ऊर्जा हट जायेगी।

करियर या बिजनेस ठीक से नहीं चल रहा हो। उसमें आये दिन कोई न कोई बाधा-परेशानी आ रही हो। व्यापार में घाटा हो रहा हो, नौकरी में पदोन्नति न मिल रही हो तो इन बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए गणेश रुद्राक्ष धारण करें। ऐसा करने से आपको लाभ होगा।

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निष्कर्ष

आदि देव गणेश सभी देवताओं में प्रथम पूजे जाते है। गणपति देव विघ्नहर्ता है। द्विजप्रिय संकष्टी के दिन आपको गणेश जी के साथ माता गौरी की भी विधिवत पूजा करने से आपके ऊपर भगवान गणेश का आर्शीवाद सदैव बना रहेगा।

तो दोस्तों आज के लेख में हमने आपको द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में सारी जानकारी सरल शब्दों में प्रदान की। उम्मीद करते है यह जानकारी आपको लाभप्रद लगी होगी। इस जानकारी को अपने दोस्तों, परिजनों के साथ साझा अवश्य करें जिससे हिन्दू धर्म के व्रत, त्योहारों का व्यापार प्रचार-प्रसार हो। आप कमेंट करके भी हमें बता सकते है कि आपको हमारे लेख कैसे लग रहे है। हमें आपके कमेंटों का इंतजार रहता है। इसी तरह के अन्य आध्यात्मिक और धार्मिक लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे।

जयश्रीराम

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