Ayodhya Ram Mandir Online Booking : अयोध्या राम मंदिर में आरती के लिए घर बैठे कैसे करें बुकिंग ?

जय श्री राम दोस्तों जैसे कि आप जानते हैं कि भगवान श्री राम लला का अभिषेक समारोह नए वर्ष के 22 जनवरी 2024 को निर्धारित किया गया है । श्री राम मंदिर के अधिकारियों ने बताया है कि यह समारोह 16 जनवरी से शुरू होकर 22 जनवरी 2024 तक सात दिनों की अवधि में आयोजित किया जाएगा । राम मंदिर के उद्घाटन से पहले, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में आरती करना चाहते हैं तो आपके लिए खुशखबरी है. क्योंकि आरती में शामिल होने के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में ‘आरती’ पास के लिए बुकिंग खोल दी गई है। यहाँ पूरे दिन तीन प्रकार की आरती की जाती है । आप किसी भी आरती के लिए अपनी बुकिंग करवा सकते हैं.

ayodhya ram mandir online booking


आरती का समय क्या है : Ayodhya Ram Mandir Arti Time

तीनो प्रकार कि आरती के लिए समय निर्धारित किया गया है. जिसका उल्लेख यहाँ दिया जा रहा है.

आरतीआरती का समय
शृंगार आरतीसुबह 6:30 बजे
भोग आरतीदोपहर 12 बजे
संध्या आरतीशाम 7:30 बजे

आपको यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि आरती में वाही लोग उपस्थिति हो सकते हैं जिनके पास यह पास होगा सुरक्षा कि दृष्टि से अभी प्रत्येक आरती में केवल तीस व्यक्तियों को ही शामिल होने की अनुमति है।

कौनसे कागजों की होगी जरूरत ?

अगर आप आरती के लिए ऑफलाइन या ऑनलाइन बुकिंग करते हैं तो पास बनवाने के लिए आईडी कार्ड या पहचान का प्रूफ दिखाना जरूरी है। इसके लिए इन चार आईडी में से कोई भी एक आईडी को दिखाकर पास बनवा सकते हैं।

  • आधार कार्ड
  • पासपोर्ट
  • ड्राइविंग लाइसेंस
  • वोटर आईडी कार्ड

आरती में शामिल होने के लिए और पास रिसीव करने के लिए आपको इन कागजों को दिखाना होगा । और जो भी आईडी प्रूफ आरती पास बुकिंग के समय दिखाई गई हो उसे आप अपने पास रखें।

‘आरती पास’ के लिए ऑनलाइन बुकिंग कैसे करें : Ram Mandir Ayodhya Online Booking

अब हम आपको स्टेप बाई स्टेप बताते हैं कि आप अयोध्या में श्री राम मंदिर में आरती में शामिल होने के लिए ऑनलाइन पास कैसे बना सकते हैं और वह भी अपने घर बैठे ; तो चलिए देखते हैं .

  • सबसे पहले आपको श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र कि अधिकारीक वेबसाइट srjbtkshetra.org पर जाना होगा.
  • उसके बाद आपको Reserve Your Passes का विकल्प दिखाई देगा उसपर क्लिक करे.
  • अब आपको एक नए पेज पर कुछ निर्देश दिखाई देंगे और उसके नीचे आपको आरती कि तारिख, आरती के प्रकार श्रद्धालुओ कि संख्या चुनना होगा और Proceed पर क्लिक करना होगा .
  • अब इसके बाद अगले पेज पर आवश्यक विवरण जैसे भक्त का नाम, पता, फोटो, मोबाइल नंबर आदि दर्ज करना होगा.
  • इस प्रकार आपका ऑनलाइन बुकिंग का चरण पूरा हो गया है .

-अब जब आप मंदिर में अपनी यात्रा पर जाते हैं तो आपको काउंटर से अपना पहचान पत्र दिखाकर पास प्राप्त करना होगा और ‘आरती’ के लिए आगे जाना होगा ।

सरल भाषा में जानिए वेद क्या है | वेद कैसे पढ़े | Ved in Hindi

वेद, प्राचीन भारत के पवित्र साहित्य हैं और हिन्दुओं के प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं । वेद मुख्यतः शब्दमय हैं और छंदोमय वाणी में हैं। वेद‘ शब्द संस्कृत भाषा के वेद् ज्ञान धातु से बना है। वेद का शाब्दिक अर्थ ‘ज्ञान‘ है। इसी धातु से ‘विदित‘ (जाना हुआ), ‘विद्या‘ (ज्ञान), ‘विद्वान‘ (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं। वेद की मूल अवधारणा में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसका कारण है उसके छंदबद्ध होने की अद्भुत शैली और वेदपाठ करने की खास विधि। वेद का दूसरा नाम है “श्रुति“। श्रुति जिसका अर्थ होता है सुनना। वेद सृष्टि के सृजनहार ब्रह्म जी के द्वारा ऋषि, मुनियों को सुनाए गए ज्ञान पर आधारित है. यही कारण है कि इसे श्रुति अर्थात सुनना भी कहता है। आज के लेख में हम वेद के इतिहास, वेद के प्रकार और वेदों के महत्व और वेदों से जुड़ी हर बात के बारे में विस्तार से जानेंगे।

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वेदों का इतिहास | वेद कितने वर्ष पुराना है | History of Vedas in Hindu Mythology | Vedas History in Hindi

दुनिया के प्रथम ग्रंथ वेद का संकलन महर्षि कृष्ण व्यास द्वैपाजन जी ने किया था। वेद मानव सभ्यता का सबसे पुराना लिखित दस्तावेज है। लिखित रूप से वेदों का इतिहास 6508 वर्ष से भी पुराना है. वेदव्यास जी (Ved Vyas) ने वेदों को लिपिबद्ध किया था। अर्थात् वेद तो अनादि है वो वेदव्यास जी (Vedvyas) के अवतार लेने के पहले भी थे। वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं।

वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।

एक ग्रंथ के अनुसार ब्रह्माजी के चारों मुख से वेदों की उत्पत्ति हुई। वेदों में आर्यों के आने व रहने का वर्णन मिलता है। वेद कितने वृहद स्तर पर हमारे जीवन में विद्यमान है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, रीति-रिवाज आदि से संबंधित सभी विषयों पर ज्ञान मिलता है।

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वेदों के रचयिता | वेदों की भाषा क्या है | Vedon Ki Bhasha Kya Hai

वेदों की रचना मनुष्यों ने नहीं की है। वे ब्रह्म के द्वारा बनाए गए हैं। इसलिए वेदों की उत्पत्ति का पता नहीं लगाया जा सकता है। पिछले 10,000 वर्षों में, उन्हें मनुष्यो द्वारा सरल भाषा का उपयोग करके लिखा गया है। वेदों को परमात्मा ने सूक्ष्म तरंगों के रूप में ऋषियों (द्रष्टाओं) को तब प्रकट किया, जब वे ज्ञान की खोज में गहन तपस्या में थे। इसलिए वेदों को ऋषियों ने सुना और इसलिए उन्हें ‘श्रुति’ कहा जाता है। वेदों में प्रयुक्त भाषा को वैदिक संस्कृत कहा जाता है, जो कि लौकिक संस्कृत से कुछ अलग होती है।

द्रष्टा इतने दयालु थे, कि वे मानव जाति के लाभ के लिए इस ज्ञान को साझा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने शिष्यों को वेदों को वाक्यों (ध्वनि) के रूप में पढ़ाना शुरू किया। शिष्यों ने अपने शिष्यों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इस प्रकार वेदों ने ध्वनि का रूप धारण कर लिया था और प्रयुक्त भाषा ‘गीरवाण’ थी जो की अब विद्यमान संस्कृत भाषा का प्राचीन रूप है। गीरवाण को ‘देवताओं की भाषा’ कहा जाता है। वेदों के भाषा रूप को ‘स्मृति’ (याद किया हुआ) कहा जाता है।

वेदों को किसने लिखा | Ved Kisne Likha | Ved Kisne Likhe The

वेद अनंत हैं। वेद समय≤ पर मानव जाति के मार्ग को रोशन करने वाली मशाल की तरह है। वेदों के संपूर्ण ज्ञान को संहिताबद्ध किया गया और ऋषि वेद व्यास द्वारा 4 प्रकारों में विभाजित किया गया था। जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद कहा जाता है। कुछ अज्ञानी विदेशियों के साथ-साथ कुछ भारतीय प्रचार करते हैं, कि वेद आर्यों द्वारा लिखे गए थे, एक अलग जाति के लोग जो उत्तर भारत में कहीं से उतरे और उस ज्ञान को भारत के शेष हिस्सों में फैलाया।

यह विचार पूरी तरह से निराधार था और इसका उद्देश्य यह फैलाना था, कि वेद भारतीयों की संपत्ति नहीं हैं। सच्चाई यह है, कि आर्य मूल रूप से भारतीय (हिंदू) थे, और वे सरस्वती नदी के तट पर मानव सभ्यता को स्थापित करने वाली पहली जाति थे, जो रामायण काल के दौरान मौजूद थी।

वेदों में सरस्वती नदी का 50 से अधिक बार उल्लेख किया गया है, जबकि गंगा नदी का केवल एक बार उल्लेख किया गया है। आर्यों (हिंदुओं) ने विज्ञान, इंजीनियरिंग, धातु विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, कृषि, वास्तुकला, चिकित्सा, राजनीति आदि के विकास का बीड़ा उठाया और उन्होंने अपने वैदिक ज्ञान से एक उत्कृष्ट सभ्यता का निर्माण किया। इसे बाद में ‘हिंदू (सिंधु) घाटी सभ्यता’ कहा गया।

वेदों के प्रकार | Ved Kitne Hain | Types of Ved | 4 Ved in Hindi | वेद कितने हैं

वेदों के सम्पूर्ण ज्ञान को ऋषि वेदव्यास द्वारा चार भागों में विभाजित किया गया है। ऋगवेद, सामवेद, अर्थववेद और यजुर्वेद। ऋग्वेद में सनातन धर्म का मूल ज्ञान, यजुर्वेद में यज्ञ परंपरा, सामवेद में संगीत का आधार और अथर्ववेद में जीवन से जुड़ी ज्ञान प्रणाली मिलती है। आईये इन वेदों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

ऋगवेद | Rig Veda in Hindi | Sabse Prachin Ved Kaun Sa Hai

ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। ऋगवेद के 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं। ऋगवेद की 5 शाखाएं हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन । इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ बताया गया है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलती है।

यजुर्वेद | Yajur Veda in Hindi

यजुर्वेद अर्थात यत् और जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। यजर्वेद हिन्दुओं का एक महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ और चार वेदों में से एक है। इसमें ऋग्वेद के ६६३ मंत्र पाए जाते हैं। फिर भी इसे ऋग्वेद से अलग माना जाता है क्योंकि यजुर्वेद मुख्य रूप से एक गद्यात्मक ग्रन्थ है। यजुर्वेद में श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा का वर्णन किया गया है। यजुर्वेद में अग्नि के माध्यम से देवताओं को दिए जाने वाले इन आहुति के बारे में बताया गया है। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र भी बताए गए हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। यह वेद गद्य मय है। यजुर्वेद में यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का भी वर्णन किया गया है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र हैं। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

कृष्ण पक्ष – वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। कृष्ण की चार शाखाएं हैं।
शुक्ल पक्ष – याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। शुक्ल की दो शाखाएं हैं। इसमें 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।

सामवेद | Sam Ved in Hindi

साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत । सामवेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप प्रेषित किया गया है । सामवेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में उपस्थित है। 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसकी मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं। सामवेद के श्लोकों को गाया जाना चाहिए, न कि जपना चाहिए। इन श्लोकों के गायन को ‘सामगान; कहते हैं।

अथर्ववेद | Atharva Veda in Hindi

धर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है। इस वेद के आठ खण्ड हैं। अथर्ववेद में लगभग 6000 श्लोक हैं, जो कि 731 भजन बनाते हैं।

वेदांग क्या है | Vedang in Hindi | वेदांग का अर्थ

वेदों का अर्थ बताने व सही उच्चारण के लिए वेदांग की रचना की गई। वेदांगों की संख्या 6 है। ये निम्न है :

  1. शिक्षा: वैदिक वाक्यों के सही उच्चारण के लिए इसका निर्माण हुआ था।
  2. कल्प: इसकी रचना वैदिक कर्मकांड को सही तरीके से करने के लिए विधि व नियमो का वर्णन किया गया है।
  3. व्याकरण: इसमें नाम व धातुओं की रचना, उपसर्ग, प्रत्यय के प्रयोग हेतु नियमों का वर्णन है।
  4. निरुक्त: निरूक्त मे शब्दों की उत्पत्ति हुई के नियम है। यह भाषा दृ शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
  5. छंद: इसमें वैदिक साहित्य के गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, वृहती का प्रयोग किया जाता है।
  6. ज्योतिष: इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। इसके प्राचीनतम आचार्य लगथ मुनि थे।

वेदों के उपवेद | Upveda of Vedas

वेदों के उपवेद भी बताए गए है। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

वेद कैसे पढ़े 2023 | Ved Kaise Padhe

वेदों को जानने के लिए वेदों को पढ़ना बहुत जरूरी है लेकिन वेदों को पढ़ना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि वेद संस्कृत भाषा में लिखित है। आम जनमानस में अपनी असली भाषा को लेकर गलफहमियां विद्यमान है। अगर हम इतिहास देखे तो आप यह जानकर हैरत में पड़ जायेंगे कि आपकी असल भाषा हिन्दी नहीं है। कलियुग में हम लोग जिस भाषा में आपस में बात करते है यह भाषा आपकी नहीं है। इतिहास के अनुसार हिंदुओं की एकमात्र भाषा संस्कृत भाषा है। संस्कृत भाषा ही हिंदू सनातन धर्म के मूल भाषा है और यह जानकारी आपको कहीं नहीं मिलेंगे। जो भी उपनिषद में उल्लेख किया गया है सभी संस्कृत भाषा में है। वर्तमान समय में संस्कृत भाषा लुप्त होती जा रहा है। युग परिवर्तन होने के चलते लोगों के भीतर भाषा भी परिवर्तन हो गया है। अगर हमारे धर्मग्रंथ संस्कृत में लिखे गये तो हमारी भाषा हिन्दी कैसे हो सकती है।

यदि आप वेद पढ़ना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले संस्कृत भाषा सीखना जरूरी है यदि आप संस्कृत भाषा में वेद पड़ सकते हैं तो आपको सब कुछ ज्ञान ऑटोमेटिक मिलेंगे क्योंकि संस्कृत भाषा में जिस प्रकार वर्णन किया गया है उसका अगर आप अनुवाद करके पड़ेंगे तो उतना आप जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते हैं । इसलिए संस्कृत भाषा सीखना आपके लिए बहुत ही आवश्यक है।

वेदों को समझना इतना आसान नहीं है, इसीलिए वेदों को विभागों में बाटकर समझाने का प्रयास किया गया है और बाद में इसे समाज के कल्याण के लिए लिखित किया गया। आज हमने वेदों से जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी को आपको बताने की कोशिश की। उम्मीद करते है यह जानकारी आपको प्रसंद आई होगी। इस जानकारी को अपने मित्रों, परिजनों के साथ शेयर अवश्य करें जिससे हिन्दू धर्म के वेदों की जानकारी सभी को प्राप्त हो सके।

आजकल बहुत सारे लोगों ने वेदों की जानकारी ऑनलाइन भी कर दी है. हमें एक वेबसाइट मिली है जहाँ आप वेदों को पढ़ सकते हैं. ऑनलाइन वेद पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.

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तिरूपति बालाजी मंदिर की अनोखी है महिमा, जाने मंदिर से जुडी सभी बातें

हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं की उपासना के लिए मंदिरों का निर्माण किया गया है। मंदिर एक ऐसी जगह होती है जहां जाने से न सिर्फ हमें सकारात्मक ऊर्जा मिलती है बल्कि हमारे मन को शांति भी मिलती है। एक अनुमान के मुताबिक भारत देश में 10 लाख से भी ज्यादा मंदिर है। आज हम भारत के असंख्य मंदिरों में से अद्भुत और रहस्यों से भरपूर तिरूपति बालाजी मंदिर (Tirupati Balaji Temple) के बारे में आपको सम्पूर्ण जानकारी देंगे। साथ ही आपको बतायंगे की आप तिरुपति बालाजी ऑनलाइन दर्शन टिकट (Tirupati Balaji Darshan Ticket 2024 ) कैसे बुक कर सकते हैं.

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तिरूपति बालाजी मंदिर कहां है (Tirupati Balaji Mandir Kaha Hai)

तिरूपति बालाजी आंध्र प्रदेश के दक्षिण पूर्वी भाग चित्तूर जिले में स्थित है। यह मंदिर समुद्र तल से 3200 फीट की ऊँचाई पर तिरूमला की पहाड़ियों पर स्थित है। तिरुमाला की सातों पहाड़ियों को भगवान विष्णु के सात सिरों की उपाधि दी गई है। मंदिर के आसपास अद्भुत घटनाएं होती है जिसके चलते इस स्थान को धरती का बैकुंठ भी कहा जाता है।

तिरूपति बालाजी मंदिर भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर देश में ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। तिरूपति बालाजी का नाम भगवान श्री वेंकटेश्वर स्वामी भी है। भगवान वेंकटेश्वर स्वामी जो स्वयं भगवान विष्णु है। यह मदिर भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर है। तिरूपति बालाजी में भगवान वेंकटेश्वर स्वामी अपनी पत्नी पद्यावती के साथ निवास करते है। इस मंदिर में देश-विदेश से हर साल असंख्य भक्त अपने मन की मुरादें पूरी करने आते है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान वेंकटेश्वर के समक्ष प्रार्थना करता है। उसे भगवान वेंकटेश्वर का आर्शीवाद प्राप्त होता है और उसके मन की हर मनोकामना पूर्ण होती है।

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तिरूपति बालाजी की मूर्ति | Tirupati Balaji Murti History

तिरुपति बाला मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर अर्थात भगवान विष्णु जी की प्रतिमा अद्भुत व अलौकिक है। यह प्रतिमा विशेष पत्थर से बनाई गई है। यह प्रतिमा इतनी जीवंत है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं भगवान विष्णु यहां विराजमान हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा पर पसीने की बूंदें देखी जा सकती हैं, जिसके चलते मंदिर में तापमान कम रखा जाता है। इस मूर्ति की सबसे रहस्यमयी बात यह है कि जब भगवान वेंकेटेश्वर की प्रतिमा पर पचाई कपूर लगाया जाता है तो इस कपूर का कोई भी प्रभाव उनकी प्रतिमा पर नहीं पड़ता है। आम तौर पर यदि यह कपूर किसी भी पत्थर पर लगा दिया जाये तो कुछ ही समय में उस पत्थर पर दरारें पड़ने लग जाती है। यह भगवान बालाजी के चमत्कार के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं है।

तिरूपति बालाजी मंदिर में कैसे करें पूजा | Tirupati Balaji Pooja Vidhi | Tirupati Balaji Temple Puja Vidhi

तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को प्रसन्न करने के लिए किसी विशेष पूजा पाठ करने की या किसी स्पेशल वस्तु को चढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। तिरूपति बालाजी मंदिर में विशेष मंत्र का जप करके भगवान बालाजी को प्रसन्न किया जाता है। यह मंत्र एक शुद्ध ध्वनि कंपन है जो मन को केन्द्रित कर देता है। इस मंत्र में इतनी शक्ति होती है कि इसको निरंतर दोहराने से यह जप मंत्र प्राण में ऊर्जा भर देता है। तिरूपति बालाजी का शक्तिशाली मंत्र – ऊँ वेंकटेश्वराये नमो नमः. श्रीमन नारायण नमो नमः, तिरुमल तिरुपति नमो नमः, जय बालाजी नमो नमः.।


तिरुपति बालाजी दर्शन ऑनलाइन टिकट बुकिंग 2024 | तिरुपति बालाजी दर्शन टिकट | तिरुपति बालाजी VIP दर्शन

तिरूपति बालाजी में आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मंदिर में लोगों की आस्था कितनी अधिक है। तिरुपति बालाजी मंदिर में हर रोज करीब 50 हजार से 1 लाख लोग दर्शन करते हैं। यहां सामान्य दर्शन करने वालों को करीब 1 से 3 दिन का समय लगता है। भीड़ बहुत ज्यादा होने की स्थिति में इससे भी ज्यादा समय लगता है लेकिन अगर आप भीड़ से बचना चाहते हैं तो आप तिरूपति बालाजी की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन बुकिंग करवा कर वीआईपी दर्शन कर सकते हैं। इस प्रक्रिया से आपको कम समय में दर्शन हो जाते हैं। तिरुपति बालाजी मंदिर में वीआईपी दर्शन करने के लिए आपको मंदिर की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाना होगा। आॅफिशियल वेबसाइट पर जाने के बाद आपका नाम, फोन नंबर और आधार कार्ड नंबर जैसी सामान्य जानकारी देकर लॉग इन करना होगा। स्पेशल एंट्री पर क्लिक करने के बाद आपके सामने सारी जानकारी आ जाएगी। वीआईपी दर्शन करने के लिए आपको 300 रू0 की टिकट मिलेगी (TTD 300 Rs Ticket Online Booking)। जबकि सामान्य टिकट आपको 50 रू0 में मिल जायेगा। तिरूपति बालाजी मंदिर जाने का सबसे सही समय अक्टूबर से मार्च के बीच का होता है।

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तिरुपति बालाजी दर्शन टाइमिंग | Tirupati Balaji Darshan Time | Tirupati Darshan Timings

सामान्य तौर पर तिरूपति बालाजी मंदिर के दर्शन सुबह 6.30 बजे से शुरु हो जाता हैं। तिरुमला में सुबह 10.30 बजे से दोपहर 12 बजे तक कल्याणोत्सव मनाया जाता है। जब आप तिरुपति दर्शन करने जाते हैं तो तिरुपट बालाजी के दर्शन करने के भी कुछ नियम हैं। नियम के अनुसार दर्शन करने से पहले आपको कपिल तीर्थ पर स्नान करके कपिलेश्वर के दर्शन करना चाहिए। फिर वेंकटाचल पर्वत पर जाकर बालाजी के दर्शन करना चाहिए। इसके बाद पद्मावती देवी के दर्शन करना चाहिए। पद्मावती देवी का मंदिर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी की पत्नी पद्यावती लक्ष्मी जी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि जब तक आप इस मंदिर के दर्शन नहीं करते, तब तक आपकी तिरुमला की यात्रा पूरी नहीं हो सकती जब तक इस मंदिर के दर्शन नहीं किए जाते।

तिरूपति मंदिर का प्रसाद | Tirupati Balaji Mandir Prasad | Tirupati Balaji Prasad Making

तिरूपति मंदिर में लड्डुओं को प्रसाद के रूप मे वितरित किया जाता है। जिसे प्रसादम कहा जाता है। इन लड्डुओं का इतिहास लगभग 300 साल से भी ज्यादा पुराना है। इन लड्डू को बनाने की विधि भी सबसे अलग है। इन्हें बनाने में बेसन, किशमिश, मक्खन, काजू और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है। हर लड््डु का वजन 174 ग्राम होता है। इन लड्डुओं को बनाने के लिए यहां के कारीगर तीन सौ साल पुरानी विधि का प्रयोग करते हैं। लड्डुओं का निर्माण बालाजी मंदिर की रसोई में किया जाता है। इस रसोई का नाम पोटू है।

इन लड्डुओं की सबसे खास बात यह है कि अगर आप यहां से लड्डु ले जाकर घर पर बनाकर खाना चाहे तो आपको वह स्वाद नहीं मिलेगा। यह मंदिर का चमत्कार ही है, कि लाख कोशिशों के बाद भी लोग यहां जैसे लड्डू घर पर नहीं बना पाते। यह लड्डु कई दिनों तक खराब नहीं होता है और इसे आप यहां से ले जाकर कई दिनों तक रखकर खा सकते है। इन लड्डुओं की कीमत 10 रूपये से लेकर 25 रूपये तक ही है। इन लड्डुओं की सुरक्षा भी काफी कड़ी होती है इन लड्डुओं को यहां से ले जाने के लिए आपको एक सुरक्षा दायरे से होकर गुजरना पड़ेगा। जिसमें सुरक्षा कोड और बायोमेट्रिक विवरण शामिल है।

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तिरूपति मंदिर में बाल देने की प्रथा | तिरुपति बालाजी बाल देने का महत्व | Tirupati Balaji Hair Donation

तिरुपति मंदिर में लोग अपने बाल दान करके या मुंडन करवाकर आते हैं। यहां पर बालों के दान के बारे में कहा जाता है कि अगर कोई मनुष्य यहां बाल दान करता है तो उसके जीवन से सारी परेशानियां दूर हो जाती है। साथ ही दान देने वाले व्यक्ति पर देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। अगर आप सोचते है कि मंदिर में केवल पुरुष ही अपने बाल कटवाते हैं, तो आप गलत हैं, यहां बच्चों और पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी अपने बाल कटवाती हैं। महिलाएं भी धन प्राप्ति के लिए कई मन्नतें मांगती हैं और इच्छा पूरी होने पर अपने लंबे बालों को दान करती हैं। यहां पर मनुष्य अपने बालों के रूप में अपने सारे पाप और बुराइयाँ मंदिर पर छोड़ जाता है तथा उसके सभी दुख देवी लक्ष्मी खत्म कर देती है। इस मंदिर पर रोजाना करीब 20 हजार लोग अपने बाल दान कर देते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां पर लोग आकर अपनी मन्नत मांगते है और जब उनकी मान्यता पूरी हो जाती है तो वह यहां आकर अपने बाल दान कर देते हैं।

तिरुपति में बालों को दान करने की पीछे की पौराणिक कथा | Tirupati Balaji Mandir Baal Kyu Dete Hai

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में भगवान बालाजी की मूर्ती पर ढेरों चीटियों का एक पहाड़ बन गया था। उस पहाड़ पर रोजाना एक गाय आया करती थी और दूध देकर चली जाती थी। जब गाय के मालिक को इस बारे में पता चला तो, वो नाराज हो गया और उसने कुल्हाड़ी से गाय का वध कर डाला। इस हमले के दौरान बालाजी के सिर पर भी चोट आई, साथ ही उनके सिर के बाल भी गिर गए। तब बालाजी भगवान की मां नीला देवी ने अपने बाल काटकर बालाजी के सिर पर रख दिए। इस तरह भगवान के सिर का जख्म बिल्कुल ठीक हो गया। खुश होकर भगवान ने उनसे कहा कि बाल शरीर की सुंदरता को बढ़ाते हैं और आपने मेरे लिए उनका त्याग कर दिया। आज से जो भी मेरे लिए अपने बालों का त्याग करेगा, उनकी हर इच्छा पूरी की जाएगी। तब से भक्त अपने बालों को बालाजी मंदिर में अपने बालों का दान कर रहे हैं।

तिरूमति बालाजी मंदिर के चमत्कारिक रहस्य | Tirupati Balaji Mandir Rahasya | Tirupati Balaji Miracles in Hindi

तिरूपति बालाजी का मंदिर अलौकिक और अनेक रहस्यों से भरा हुआ है। इस मंदिर में ऐसे अनेक रहस्य है जिनका जवाब आज तक नहीं मिला है। कुछ ऐसे अनसुलझे प्रश्न है जिनका जवाब विज्ञान के पास भी नहीं है।
तिरूपति में भगवान वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर जो बाल लगे हैं वो असली हैं। आश्चर्य की बात यह है कि यह बाल हमेशा मुलायम रहते है और कभी भी उलझते नहीं हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां भगवान वेंकटेश्वर खुद उपस्थित हैं।

जब हम मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करते है तो ऐसा लगता है कि भगवान श्री वेंकेटेश्वर की मूर्ति गर्भ गृह के मध्य में है, लेकिन जैसे ही आप गर्भगृह के बाहर आएंगे तो आपको ऐसा लगेगा कि भगवान की प्रतिमा दाहिनी तरफ है। यह भ्रम है या चमत्कार इसका जवाब आज तक नहीं मिला है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर के रूप में मां लक्ष्मी भी समाहित हैं जिसकी वजह से श्री वेंकेटेश्वर स्वामी को स्त्री और पुरुष दोनों के वस्त्र पहनाने की परम्परा है।

भगवान वेंकेटेश्वर स्वामी के मंदिर से 23 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है। इस गांव में गांव के नागरिकों के अलावा कोई बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता। बालाजी मंदिर में चढ़ाया जाने वाला पदार्थ जैसे की फूल, फल, दही, घी, दूध, मक्खन आदि सभी वस्तुएं इसी गांव से आती हैं।

तिरूपति मंदिर में मुख्य द्वार के दरवाजे पर दाईं तरफ एक छड़ी है। इस छड़ी के बारे में ऐसी मान्यता है कि बाल्यावस्था में इस छड़ी से ही भगवान वेंकेटेश्वर की पिटाई की गई थी जिसकी वजह से उनकी ठुड्डी पर चोट लग गई थी। तब से आज तक उनकी ठुड्डी पर हर शुक्रवार को चंदन का लेप लगाया जाता है। ताकि उनका घाव भर जाए।

गुरुवार के दिन भगवान वेंकेटेश्वर को चंदन का लेप लगाया जाता है। भगवान के श्रृंगार को हटाकर उन्हें स्नान कराकर उनकी प्रतिमा पर चंदन का लेप लगाया जाता है और जब इस लेप को हटाया जाता है तो भगवान वेंकेटेश्वर के हृदय में माता लक्ष्मी जी की स्पष्ट आकृति दिखाई देती है।

यदि कोई भक्त भगवान श्री वेंकटेश्वर की मूर्ति पर कान लगाकर ध्यान से सुनता है तो उसे सागर की लहरों का शोर सुनाई देता है।

तिरूपति मंदिर से जुड़ा एक और ऐसा अद्भुत रहस्य है जिसे चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। श्री वेंकेटेश्वर स्वामी के मंदिर में हमेशा एक दीपक जलता रहता है और सबसे ज्यादा चैंकाने वाली बात यह है कि इस दीपक में कभी भी तेल या घी नहीं डाला जाता। इतना ही नहीं आज तक यह भी पता नहीं चला है कि इस दीपक को सबसे पहले किसने और कब प्रज्वलित किया था।

भूलकर भी तिरूपति मंदिर में ऐसा ना करें | Tirupati Balaji Temple Rules | तिरुपति बालाजी के दर्शन नियम 2024

  • तिरूपति मंदिर की अधिकारी वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक इस मंदिर में भगवान की पूजा के अलावा अन्य किसी भी उद्देश्य से मंदिर में ना जाएं।
  • मंदिर परिसर में या उसके आसपास जूते-चप्पल न पहनें।
  • मंदिर के अंदर कभी भी दण्डवत प्रणाम न करें।
  • तिरूपति बालाजी मंदिर में दिए गए प्रसाद को कभी भी जमीन पर ना गिरने दे।
  • तिरुमाला में मांसाहारी भोजन न करें। ना ही शराब या अन्य किसी नशीले पदार्थ का सेवन न करें और धूम्रपान न करें।
  • मंदिर परिसर के अंदर हेलमेट, टोपी, पगड़ी और टोपी न पहनें।

तो ये थी दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में से एक तिरूपति बालाजी मंदिर के बारे में सम्पूर्ण जानकारी। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा तो अपने शेयर अवश्य करें जिससे हिन्दू धर्म के मंदिर, तीर्थों का व्यापक प्रचार-प्रसार हो।

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सिद्धिविनायक मंदिर की अनोखी है खासियत, जाने इस मंदिर से जुड़ी सारी जानकारी | Shri Siddhi Vinayak Ganapati Mandir

आज कि पोस्ट “सिद्धिविनायक मंदिर दर्शन कैसे करें और सिद्धिविनायक मंदिर कैसे पहुंचे” में हमने आपको महत्वपूर्ण जानकारी दी है. हिन्दू धर्म में गणेश जी की पूजा का महत्व है। किसी भी नये कार्य को शुरू करने के पहले गणेश जी की पूजा का विधान है। किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ गणपति जी की आराधना के साथ किया जाता है। गणपति जी प्रथम पूज्य है। भगवान गणेश के भारत वर्ष में कई मंदिर है। इन्हीं मंदिरों में से गणेश जी का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है सिद्धिविनायक मंदिर (Siddhi Vinayak Temple) की अनोखी है खासियत, जाने इस मंदिर से जुड़ी सारी जानकारी। सिद्धिविनायक मंदिर भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई शहर के प्रभादेवी इलाके में स्थित है। आज के लेख में हम आपको गणेश जी के प्रसिद्ध मंदिर सिद्धिविनायक मंदिर के बारे में सभी जानकारी विस्तार से देंगे।

कब हुआ सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण | Siddhivinayak Temple History in Hindi

सिद्धिविनायक मंदिर में गणपति के विनायक रूप की आराधना की जाती है। यह मंदिर कितना प्राचीन है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकताा है कि इस मंदिर का निर्माण सन् 1801 ई0 में हुआ था। इस हिसाब से देखा जाये तो यह मंदिर 200 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। इस मंदिर को लक्ष्मण विधु पाटिल नाम के ठेकेदार द्वारा द्वारा बनवाया गया था। इनकी पत्नी का नाम देउबाई पाटिल था। वह एक कृषक थी। ये दंपत्ति निःसंतान थे। मंदिर के निर्माण के लिए जो धनराशि खर्च हुई वह देउबाई पाटिल द्वारा दी गई थी। वह महिला निःसंतान थी वह गणेश जी के मंदिर के निर्माण के लिए धनराशि देना चाहती थी। महिला निःसंतान होने के चलते वह इस दुख को जानती थी इसलिए वह चाहती थी कि जो भी भक्त इस मंदिर में आये, गणपति भगवान उसकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार करें और उनके आर्शीवाद से उसको संतान सुख की प्राप्ति हो। प्रारम्भ में यह मंदिर ईटों से बना था और इसका आकार काफी छोटा था। बाद में इसका पुननिर्माण किया गया और इसे तात्कालिक विशालकाय मंदिर का स्परूप दिया गया।

सिद्धिविनायक मंदिर में 37 गुंबद है जिसके चलते इस मंदिर का आकर्षण देखते ही बनता है। सिद्धिविनायक के पुराने मंदिर में एक हाॅल, गर्भगृह, बरामदा और पानी की टंकी देखी जा सकती है। वास्तुकार शरद अथले ने इस मंदिर का पुननिर्माण 1990 में किया जिसके लिए उन्होंने राजस्थान और तमिलनाडु के मंदिरों का गहन अध्ययन किया। पुरानी मूर्ति का नवनिर्माण किया गया और उसे बहुकोणीय छः मंजिला पर रखा गया। मंदिर में तीन प्रवेश द्वार बनाये गये जिनसे मंदिर के अंदर एंट्री होती है। मंदिर के मुकुट को भी एक नया रूप दिया गया। इसकी छत में सोने की परत बिछाई गई। तीन साल तक रात-दिन काम चलने के बाद मंदिर का अद्भुत और आकर्षक रूप आज गणपति के भक्तजनों के सम्मुख है।

सिद्धिविनायक मंदिर की मूर्ति | Siddhivinayak Ganpati Murti

सिद्धिविनायक मंदिर में भगवान गणेश की सिद्धिविनायक प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा अनूठी शिल्कारी से परिपूर्ण है। मंदिर के गर्भगृह पर लकड़ी के दरवाजे है जिन पर अष्टविनायक की प्रतिमा अव्यवस्थित है। इस मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा के चार हाथ है जिसके चलते उन्हें चतुर्भुज भी कहा जाता है। इस प्रतिमा के ऊपर के दो हाथों में दाहिने हाथ में कमल है जबकि बांए हाथ में अंकुश शोभावान है। जबकि नीचे के दाहिनी हाथ में एक माला है जो मोतियों की है जबकि बाएं हाथ में गणेश जी लड्डुओं से भरा कटोरा लिये हुए है। गणपति भगवान के अगल-बगल उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि (Ridhhi Siddhi) विराजमान है। रिद्धि ओर सिद्धि को धन, यश, वैभव, ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। इस प्रतिमा के माथे पर एक तीसरा नेत्र है। गले में एक सर्प लिपटा हुआ है। सिद्धिविनायक मंदिर का विग्रह करीब ढाई फीट ऊँचाा है। यह विग्रह दो फीट चैड़े काले संगमरमर के तरासे से हुए पत्थर से निर्मित है। इस मंदिर की छतों पर सोने की परते लगी हुई हैं। मंदिर के अंदर चांदी के चूहों को दो बड़ी मूर्तियां भी लगी हुई है जिनके बड़े-बड़े कान है। भक्त अपनी मनौती चूहों के कान में कहते हैं। इस क्रिया को मंदिर में आने वाला हर भक्त दोहराता है। ऐसी मान्यता है कि चूहों के जरिए भक्त की मनौती गणेश जी तक पहुंच जाती है। गणपति महाराज अपने भक्तों के मन की मुराद अवश्य पूरी करते हैं। इस मंदिर के दर्शन हमेशा से लाभकारी और विघ्नों को हरने वाले होते है। इस मंदिर के पुजारियों के लिए भी यहां रहने की व्यवस्था बनी हुई है। सिद्धिविनायक मंदिर की सबसे ऊपरी मंजिल पर यहां के पुजारी रहते हैं। इनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था भी मंदिर प्रशासन ही देखता है।

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सिद्धिविनायम को नवसाचा गणपति या नवसाला पावणारा गणपति के नाम से भी जाना जाता है। गणपति जी का यह नाम मराठी भाषा से लिया गया है। मुंबई में असंख्य मराठी लोग रहते है और वह गणपति जी को इसी नाम से पुकारते है।

सिद्धिविनायक मंदिर की विशेषता | Why Siddhivinayak Temple is Famous

आमतौर पर हम घरों में ऐसी गणपति की आराधना करते है जिनकी सूंड बांई ओर घूमी होती है। जिन गणपति की प्रतिमा की सूंड दाहिनी ओर घूमी होती है वह सिद्धपीठ कहलाती है। सिद्धिविनायक मंदिर गणपति भगवान का सिद्धिपीठ है। इन मंदिरों की यह खासियत होती है यहां के गणपति शीघ्र ही प्रसन्न भी हो जाते है और जल्द ही नाराज भी हो जाते है। सिद्धिविनायक मंदिर के दरबार से कोई भी भक्त कभी निराश नहीं लौटता है। बप्पा उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं।
यह मंदिर सर्वधर्म संभाव का जीता जागता स्वरूप है। इस मंदिर में हर धर्म, हर जाति के लोगों को प्रवेश मिलता है। इस मंदिर में गणपति का दर्शन करने और उनका आर्शीवाद पाने सभी धर्म और जाति के लोग आते हैं। किसी के साथ कोई भेदभाव नही किया जाता।

वैसे तो इस मंदिर में रोज ही भीड़ होती है लेकिन मंगलवार के दिन इस मंदिर में जबरदस्त भीड़ होती है। इस दिन की आरती भी बहुत लाभकारी होती है जिसमें भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। कई-कई किमी तक भक्तों की लंबी कतारे देखी जा सकती है। जो भक्त सिद्धिविनायक मंदिर में दर्शनों को आते है उन्हें चार-पांच घंटे से ज्यादा समय लाइन में खड़ा होना पड़ता है और उसके बाद ही वह आदि देव गणपति देव के दर्शन कर पाते है। मंदिर में दो लाइनें लगती है एक लाइन उन लोगों के लिए होती है जिन्हें मंदिर में पूजा करवानी होती है तो दूसरी लाइन में वह लोग खड़े होते है जिन्हें गणपति के सिद्धिविनायक रूप के दर्शन करने होते है। मंदिर के अंदर जूते, मोबाइल, बेल्ट, कैमरा आदि ले जाना सख्त मना है। बाहर ही इन सभी सामानों को जमा करा लिया जाता है।

हर साल भद्रपद मास गणेश की गणेश चतुर्थी से अनंत चर्तुदशी तक यहां देश से ही नहीं विदेशों से भी लाखों श्रद्धालु सिद्धिविनायम गणेश जी के दर्शनों को आते है और उनके समक्ष अपनी मनोकामना रखते है। बप्पा के आर्शीवाद से उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। हर महीने की गणेश चतुर्थी पर भी बड़ी संख्या में भक्तगण गणपति दर्शनों को यहां आते है।

सिद्धिविनायक मंदिर की कहानी | Story of Siddhivinayak Temple | सिद्धिविनायक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि का निर्माण करते समय श्री हरि भगवान विष्णु को नींद आ गई। जिस समय उन्हें नींद आई उसी समय उनके कानों से मधु और कैटभ नाम के दो राक्षस निकले। अपनी राक्षसी प्रवृत्ति के चलते ये दोनों राक्षस ऋषि-मुनियों और देवताओं को परेशान करने लगे। उनकी पूजा-पाठ में बाधा उत्पन्न करने लगे। इन दोनों राक्षसों के अत्याचार से दुखी होकर देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष अपनी गुहार लगाई और इन राक्षसों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। देवताओं की गुहार सुनकर भगवान विष्णु नींद से जाग गये और उन्होंने उन राक्षसों को मारने का प्रयास किया लेकिन वह उनका वध करने में असफल रहे। तब भगवान विष्णु ने शिव जी से मदद मांगी। शिव भगवान ने उन्हें बताया कि अगर उन्हें इन राक्षसों का वध करना है तो भगवान गणेश की मदद लो क्योंकि उनके बिना यह काम नहीं हो सकता। तब भगवान विष्णु गणेश जी आवाहन करते हुए उनसे प्रार्थना की। भगवान विष्णु की प्रार्थना सुनकर भगवान गणेश प्रकट हो गए और उन्होंने अपनी शक्ति से उन दोनों राक्षसों का वध कर दिया। उन राक्षसों के वध के बाद श्री हरि भगवान विष्णु ने एक पर्वत पर जाकर एक मंदिर बनाकर उस मंदिर में भगवान गणेश की प्रतिमा की स्थापना की । तब से इस स्थान को सिद्धिटेक और वह मंदिर सिद्धिविनायक के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

आरती का समय | Siddhivinayak Temple Timing | सिद्धिविनायक दर्शन का समय

मंदिर भक्तों के दर्शनों के लिए सुबह 4 बजे खुल जाता है। उसके बाद मंदिर में सुबह 5 बजे से 5ः30 बजे तक कांकड़ आरती होती है। उसके बाद भक्त फिर से गणपति बप्पा के दर्शन कर सकते है। सुबह 10ः45 बजे से दोपहर 01ः30 तक गणपति जी का अभिषेक और आरती होती है। संध्या आरती शाम 7 बजे से 8 बजे तक होती है। मंदिर बंद होने से पहले शेज आरती रात्रि 10 बजे की जाती है।

पूजा का है विशेष विधान | Siddhivinayak Mandir Pooja

इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मनोकामना बप्पा के सम्मुख रखता है, बप्पा उससे प्रसन्न होकर उसकी मनचाही मुराद पूरी करते है। यहां पर पूजा करने का कुछ खास विधान है। मंदिर के प्रांगण में दो चांदी के बड़े चूहो है उनके कानों में जाकर अगर आप अपने मन की मुराद दुहारते है तो ऐसी मान्यता है कि यह संदेश सीधे गणेश जी तक पहुंचता है और गणपति देव आपकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। इसके अलावा मंदिर प्रांगण में भगवान के सम्मुख बैठकर अपनी मनोकामना को चिट्ठी में लिखते है और ऐसा लोगों का विश्वास है कि इस प्रार्थना को गणेश जी जल्द सुन लेते है।

सिद्धिविनायक दर्शन टुडे | Siddhivinayak Live Darshan | Siddhivinayak Darshan Today

अगर आप भगवान् श्री गणेश जी सिद्धि विनायक मंदिर के लाइव दर्शन करना चाहते हैं तो आपके लिए यह सेवा भी उपलब्ध है. मंदिर की संस्था की वेबसाइट पर आप श्री गणेश जी के लाइव दर्शन कर सकते हैं. जब आप इनकी वेबसाइट पर लॉग इन करेंगे तो आपको मंदिर के लाइव दर्शन हो जायंगे, जहाँ पर मंदिर में श्री गणेश जी की पूजा करते हुए मंदिर जी दिखाई देते हैं. इस साईट का लिंक निचे दिया जा रहा है.

कैसे जाएं सिद्धिविनायक मंदिर | How to Reach Siddhi Vinayak Temple | सिद्धिविनायक मंदिर कैसे पहुंचे

सिद्धिविनायक मंदिर आप सड़क मार्ग, बस द्वारा, रेलगाड़ी द्वारा और हवाई जहाज इन सभी तरीकों से जा सकते है। भारत के कई राज्यों और शहरों के लिए मुंबई के लिए बस व ट्रेन सेवा उपलब्ध है। हवाई जहाज से जाने के लिए आपको मुंबई छत्रपति शिवाजी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पर उतरना होगा। वहां से मंदिर लगभग 30 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। हवाई अड्डे से आप कोई भी कैब बुक करके प्रभादेवी पहुंचकर मंदिर तक आसानी से पहुंच सकते हैं।

बस से जाने के लिए आपको मुंबई सेंट्रल बस स्टेशन उतरना होगा, लेकिन अगर आप पुणे और नासिक से यहां आना चाहते हैं तो आपको दादर रेलवे स्टेशन के पास एएसआईएडी बस स्टैंड पर पहुंचना होगा। दादर बस स्टेशन पर पहुंचने के बाद आप कोई भी लोकल या सिटी बस से प्रभादेवी पहुंच सकते है।

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सिद्धिविनायक जाने का सबसे अच्छा समय | Siddhivinayak Temple Timings

वैसे तो आप साल भर में कभी भी सिद्धिविनायक मंदिर में दर्शनों को आ सकते है लेकिन अक्टूबर से फरवरी के मध्य का समय सिद्धिविनायक मंदिर के दर्शनों का सबसे उपयुक्त समय होता है। आप दोपहर में किसी भी समय मंदिर में दर्शन कर सकते हैं क्योंकि दिन में मंदिर में भीड़ काफी कम रहती है। मुंबई मार्च के महीने से मुंबई में बहुत गर्मी पड़ना शुरू हो जाती है। सिद्धिविनायक में आने वाले दर्शनार्थियों की भीड़ को देखते हुए भी गर्मी में लाइन में घंटों खड़े रहना एक मुश्किल कार्य है। इसलिए इन महीनों में सिद्धिविनायक जाने से बचना चाहिए। गणेश जी के विशेष पर्व विनायकी चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, माघी श्री गणेश जयंती और भाद्रपद श्री गणेश चतुर्थी इन त्योहारों में भी आप गणपति जी के दर्शनों का आनन्द उठा सकते हैं।

सिद्धिविनायक मंदिर देश भर में गणेश जी के मौजूद मंदिरों में से एक मात्र सिद्धिपीठ मंदिर (Siddhi Peeth Teample) है। इस मंदिर में एक बार जो भक्त आदि देव श्री गणेश जी के दर्शन कर लेता है, वह बार-बार अपने को इस मंदिर से आने से नहीं रोक पाता। इस मंदिर में आने से असीम आनंद और उत्तम फल की प्राप्ति होती है।

सिद्धिविनायक दर्शन ऑनलाइन बुकिंग | Siddhivinayak Mandir Darshan Booking | VIP Darshan Tickets

अगर आपने भगवन गणेश जी की सबसे प्रसिद्द मंदिर श्री सिद्धि विनायक मंदिर के दर्श करने का मन बना लिया है तो आप यह जरुर सोच रहे होगे कि दर्शा कैसे करें, ऑनलाइन बुकिंग कैसे करे, कितना खर्चा आयगा, आदि. तो आपको बता दें क आपको ज्यादा परेशां होने की कोई अज्रुरत नहीं है. मंदिर की वेबसाइट पर सभी जानकारी उपलब्ध करवाई गई है. और आप भगवन के दर्शन और पूजा के लिए वेबसाइट या मोबाइल एप पर ही ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं.

आपको बता दे की अगर आप ऑनलाइन बुकिंग करते हैं आपको 200 रुपये प्रति व्यक्ति चार्ज देना होगा. और अगर आप बिना बुकिंग करे दर्शन करने जाते हैं तो आपको कोई चार्ज नहीं देना होता.

निष्कर्ष

तो दोस्तों आज के लेख में हमने मुंबई में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर के बारे में सारी जानकारी विस्तृत रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत की। उम्मीद करते है कि इस मंदिर की ख्याति जानकर आप भी यहां जाने से अपने आपको रोक नहीं पाएंगे। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों, परिजनों के साथ साझा अवश्य करें जिससे भारत के प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में जनमानस में प्रचार-प्रसार हो। ऐसे ही धार्मिक और आध्यात्मिक लेखों को पड़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे। जयश्रीराम

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अपनी राशि कैसे पता लगाएं | Apni Rashi Kaise Pata Kare

जय श्री राम मित्रों ! आज की पोस्ट में हम आपको बतायंगे कि कैसे जाने अपनी राशि (Apni Rashi Kaise Pata Kare), जन्मतिथि या नाम में से कौन सी राशि अधिक प्रभावी होती है.

हमारे दैनिक जीवन में राशि का बड़ा महत्व होता है। आज के समय में हर व्यक्ति यह जानना चाहता है कि उसकी राशि कौन सी है क्योंकि उस राशि के द्वारा ही वह अनुमान लगाता है कि आज के दिन उसके जीवन में क्या घटित होने वाला है। अगर राशि में कुछ अच्छा लिखा होता है तो वह दिन भर खुश रहता है कि आज के दिन मेरे साथ कुछ अच्छा होने वाला है, वहीं अगर कुछ खराब लिखा होता है तो वह सतर्क हो जाता है और राशिफल में बताए गये उपायों को करता है। न सिर्फ दैनिक बल्कि अब तो लोग अपने राशि के द्वारा ही यह अनुमान लगाते हैं कि उनका महीना, उनका वर्ष कैसा बीतने वाला है। ऐसे में राशि की महत्ता और भी बढ़ जाती है। विवाह, यज्ञोपवित्र संस्कार या कोई धार्मिक आयोजन के समय भी राशि नाम की प्रधानता होती है। तो आईये जानते है कि कैसे आप यह पता लगा सकते हैं कि आपकी राशि कौन सी है।

राशि कैसे जाने | Rashi Kaise Dekhen | Apni Rashi Kaise Jane

राशि शब्द मुख्यतः संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है समूह। राशि तीन तरीकों से निकाली जाती है। पहली सूर्य आधारित राशि, दूसरी चंद्र आधारित राशि, तीसरी अंक शास्त्र पर आधारित राशि। इन तीनों तरीकों को जानकर आप अपनी राशि के बारे में जान सकते हैं। आज हम इन तीन तरीकों के बारे में ही विस्तार से चर्चा करेंगे।

सूर्य आधारित राशि कैसे जाने | How to Decide Zodiac Sign | Sun Sign in Hindi

बोलचाल की भाषा में जब कोई आपसे आपकी राशि पूछता है तो वह आपके सूर्य की स्थिति को जानना चाहता है। इस तरह हम कह सकते है कि सूर्य राशि वह होती है जब जातक के जन्म के समय सूर्य जिस राशि में उपस्थित होता है। वह जातक की सूर्य राशि कहलाता है। ऐसे में जन्मतिथि के आधार पर ही सूर्य राशि का पता लगाया जा सकता है। आपके सूर्य राशि के चिन्ह से ही आपके व्यक्तित्व की पूरी जानकारी प्राप्त होती है। सूर्य हर राशि में एक माह रहता है। किस-किस तिथि को सूर्य किस राशि पर रहता है उसकी जानकारी निम्नवत है-

जन्म तारीख से राशि कैसे जाने | Janmtithi Se Apni Rashi Kaise Pata Karte Hain

मेषः 21 मार्च – 19 अप्रैल

वृषभः 20 अप्रैल – 20 मई

मिथुनः 21 मई – 21 जून

कर्क: 22 जून – 22 जुलाई

सिंहः 23 जुलाई – 22 अगस्त

कन्याः 23 अगस्त – 22 सितंबर

तुलाः 23 सितंबर – 23 अक्टूबर

वृश्चिकः 24 अक्टूबर – 22 नवंबर

धनुः 23 नवंबर – 21 दिसंबर

मकरः 22 दिसंबर – 19 जनवरी

कुंभः 20 जनवरी – 18 फरवरी

मीनः 19 फरवरी – 20 मार्च

इस तरह हम ऊपर दी गई सूची को देखकर अपनी जन्मतिथि की सहायता से अपनी राशि पता कर सकते हैं। पाश्चत्य ज्योतिष में सूर्य राशि को अहमियत दी गई है। सूर्य राशि से हमारे बाहरी व्यक्तित्व की जानकारी मिलती है।

चंद्र राशि कैसे जाने | Chandra Rashi Kya hoti Hai | Moon Sign in Hindi | Chandra Rashi Kaise Pta Kare

सूर्य राशि के अनुसार ही किसी जातक के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में विराजमान होता है। वहीं जातक की चंद्र राशि कहलाती है। चंद्रमा की गति बहुत तेज होती है, वह हर राशि में 54 घंटे (दो से ढाई दिनों) रहकर दूसरी राशियों में प्रवेश कर जाता है। जब चंद्र राशि का पता चल जाता है तो उसी राशि के स्वामी, जन्म कुंडली की लग्न राशि व उसके स्वामी व ग्रह दशा देखकर चंद्र राशि के अनुसार जातक के भविष्यफल के बारे में बताया जाता है। ज्योतिष में चंद्र राशि की प्रधानता है क्योंकि चंद्र राशि के अनुसार ही जातक की भावनात्मक और मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। चंद्र राशि के द्वारा ही हम उसके विचारों, इच्छाओं और चिंताओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

अंकशास्त्र द्वारा राशि निर्धारण | Ank Rashi Kya Hai | मूलांक कैसे निकाले

अंकशास्त्र से राशि जानने के लिए हमे सबसे पहले अपना मूलांक जानना होता है। मूलांक मुख्यतः 1 से 9 तक होते है। किसी व्यक्ति की जन्म तारीख से उसके मूलांक का निर्धारण होता है। इसे ऐसे समझ सकते है जैसे किसी व्यक्ति का जन्म 15 तारीख को हुआ तो उसका मूलांक 6 है। आईये जानते है कि मूलांक के आधार पर राशि व उसके स्वामी के बारे में जानकारी हासिल करते हैं।

मूलांक एक अंक का स्वामी सूर्य हैं।

मूलांक एक वाले सिंह राशि के होते हैं।

मूलांक दो का स्वामी चंद्रमा है।

वहीं, मूलांक दो वालों की राशि कर्क होती है।

तीन मूलांक का स्वामी गुरू को माना जाता है। इस मूलांक के लोग धनु राशि के होते हैं।

मूलांक चार का स्वामी राहु है, मूलांक चार वालों की राशि कुम्भ होती है।

मूलांक पांच का स्वामी बुध होता है और राशि मिथुन और कन्या मानी जाती है।

मूलांक छह का स्वामी शुक्र को माना जाता हैं, मूलांक छह वालों की राशि वृष और तुला होती है।

मूलांक सात अंक का स्वामी केतु होता हैं और सात मूलांक वालों की राशि मीन होती है।

मूलांक आठ का स्वामी शनि होता हैं और राशि मकर होती है।

मूलांक नौ का स्वामी मंगल होता हैं और मूलांक नौ वालों की राशि मेष व वृश्चिक होती है।

सूर्य राशि और चंद्र राशि के बीच अंतर | Difference Between Sun Sign & Moon Sign Hindi

सूर्य राशि के द्वारा जातक के वाहय स्वरूप की जानकारी प्राप्त होती है जबकि चंद्र राशि के द्वारा जातक के आंतरिक व्यक्तित्व की जानकारी प्राप्त होती है।

सूर्य राशि हमारे अहं और हमारे मन में उठने वाली हर इच्छा का प्रतीक है। आप जो भी विचार करते हैं, सोचते हैं उसका आधार सूर्य राशि ही होती है। जबकि चंद्र राशि से आप अवचेतन के साथ-साथ आपकी भावनाओं और आपके आस-पास की दुनिया के प्रति आपके मन में उठने वाली प्रतिक्रियाएं को दर्शाता हैं।

आप अपने जन्म की तारीख जानकर अपनी सूर्य राशि का निर्धारण कर सकते हैं, हालांकि, चंद्रमा की राशि की पहचान करने के लिए, आपको अपनी जन्म तिथि, अपने जन्म समय और जन्म स्थान के बारे में पता होना जरूरी है।

सूर्य हर राशि में एक माह रहता है इस तरह 12 माह में 12 राशियों पर रहता है। जबकि चंद्रमा की गति तेज होती है और उसे एक राशि से दूसरी राशि में जाने में केवल ढाई दिन लगता है।

सूर्य चिन्ह को आमतौर पर किसी व्यक्ति के सामान्य दृष्टिकोण के रूप में माना जाता है, लेकिन चंद्र राशि के द्वारा किसी व्यक्ति के आंतरिक सोच, उसके मन में उठने वाले विचार और छिपी हुई क्षमता के बारे में विशिष्ट जानकारी प्रदान करती है।

सूर्य राशि या चंद्र राशि कौन अधिक प्रभावी | Sun Sign or Moon Sign Which is More Important

सूर्य राशि की तुलना में चंद्र राशियों का हमारे जीवन पर अधिक प्रभाव पड़ता है। सूर्य ग्रह को आत्मविश्वास और आत्मा का कारक माना गया है। चंद्र राशि के द्वारा व्यक्ति के अंदर की भावनाएं पता चलती है, उसका स्वभाव पता चलता है। यही कारण है कि भारतीय ज्योतिष शास्त्र में चंद्र राशि की प्रधानता है। चंद्र राशि के द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में सही जानकारी दी जा सकती है। किसी व्यक्ति के गुणों और व्यक्तित्व के बारे में पता लगाया जा सकता है। इसके उलट पाश्चात्य ज्योतिष में सूर्य राशि की प्रधानता है। सूर्य राशि से किसी व्यक्ति के बाहरी व्यक्तित्व की ही पहचान होती है क्योंकि एक जन्मतिथि पर कई लोग पैदा हुए होते है, उनकी सोचने-समझने की क्षमता अलग-अलग होती है। ऐसी मान्यता है कि हमारा सूर्य चिन्ह आपके बाहरी स्व का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि चंद्रमा अंदर की गतिविधियों का कारक है। सूर्य राशि और चंद्र राशि में सबसे बड़ी भिन्नता यह है कि सभी 12 राशियों को पार करने के लिए जहां सूर्य को 12 महीने लगते है यानी एक राशि में सूर्य एक माह तक रहता है। ऐसे में सूर्य राशि से सटीक भविष्यवाणी करना संभव नहीं होता है क्योंकि उस एक माह के दौरान कई व्यक्ति जन्म ले चुके होते है। इसके विपरीत चंद्रमा की चाल तीव्र होती है, वह एक राशि में ढाई दिनों तक ही रहता है इसलिए चंद्र राशि के द्वारा की गई भविष्यवाणी ज्यादा प्रभावी होती है।

किसी व्यक्ति की राशि उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को परिभाषित करती है। इसके द्वारा न सिर्फ उसकी बाहरी व्यक्तित्व बल्कि आंतरिक व्यक्तित्व के बारे में भी पता चलता है। इस तरह हम कह सकते है कि किसी व्यक्ति की राशि जानकर हम उसके विषय में सभी कुछ जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। राशि का प्रभाव उस व्यक्ति पर जीवन पर्यन्त रहता है। यही कारण है कि जन्म के समय नाम रखते समय काफी विचार किया जाता है। राशि के अनुसार ही जन्मकुंडली बनाई जाती है। आज के लेख में हमने राशि कैसे निकाले इस संबंध में आपको जानकारी दी तथा इसके प्रकार भी बताए। उम्मीद करते है उपरोक्त लेख आपको अच्छा लगा होगा। अगर यह लेख आपको अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों, परिजनों के साथ शेयर अवश्य करें। ऐसे ही जानकारीपूर्ण लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे।

जयश्रीराम

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पितृ दोष क्या होता है | पितृ दोष निवारण के सरल उपाय | Pitra Dosh Kya Hota Hai

पितृ दोष के चलते जीवन में आती है परेशानियां, इन उपायों को करने से दूर होगा पितृ दोष

हिन्दू धर्म में पितरों का प्रमुख स्थान है। जब किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो वह पितर बन जाता है। पितरों को भगवान का दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध किया जाता है। जिस तिथि को उनकी मृत्यु हुई होती है उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। उस तिथि को ब्राहमण को बुलाकर भोजन कराने और दान करने से पितरों का आर्शीवाद प्राप्त होती है और श्राद्ध करने वाला व्यक्ति फलता-फूलता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष के समय पितर स्वयं पृथ्वी पर आते है और जो जातक अपने पितरों का विधि विधान से श्राद्ध करता है तो उससे पितर प्रसन्न होते है और उसे जीवन में किसी तरह की कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है।

एक तरफ जहां पितरों के आर्शीवाद से जातक का कल्याण होता है, वहीं पितृ दोष के चलते व्यक्ति को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आज के लेख में हम पितृ दोष क्या होता है, पितृ दोष के लक्षण और उपाय, आदि विषयों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

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पितृ दोष क्या है | पितृ दोष क्यों होता है | Pitra Dosh Kya Hai

पुराणों में ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका विधि-विधान से अंतिम संस्कार ना किया जाये या किसी व्यक्ति की अकस्मात मृत्यु हो जाऐ तो उसके परिजनों को पितृ दोष का सामना करना पड़ता है। वहीं ज्योतिष के अनुसार अगर किसी जातक की कुडली का नवां घर खराब ग्रहों से ग्रसित है तो उसे पितृ दोष का सामना करना पड़ता है। कुंडली का नवा घर धर्म का होता है, यह पिता का घर भी कहलाता है। अगर नवे ग्रह में राहु या केत बैठा हो तो पितृ दोष होता है। पितृ दोष से ग्रसित व्यक्ति को कई शारीरिक और मानसिक समस्याएं घेरे रहती है। पितृ दोष के कई लक्षण हमें अपने जीवन में दिखाई देते है। आईये उन लक्षणों के बारे में जानते है –

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पितृ दोष के लक्षण | Pitra Dosh Ke Lakshan | Pitradosh Ke Sanket

  1. पितृ दोष के लक्षण हमे अपने जीवन कई बार दिखाई देते हैं जो बात का परिचायक होते है कि हम पितृ दोष से पीड़ित है। आईये इन लक्षणों को जानते है-
  2. नौकरी में सही तरीके से कार्य करने के बावजूद आशानुरूप परिणाम न मिलना। बिजनेस में मेहनत करने के बावजूद लाभ के बजाय हानि होना यह इस बात का द्योतक है कि उक्त जातक पितृदोष से पीड़ित है।
  3. विवाह होने में अड़चन आना या विवाह होने के बाद भी दाम्पत्य जीवन सुखमय ना होना। विवाह तलाक की दहलीज तक पहुंच जाये तो समझ लेना चाहिए कि पितृ दोष का प्रभाव है।
  4. परिवार के सदस्यों के बीच कलह, लड़ाई-झगड़ा बढ़ जाना, बात-बात पर विवाद होना भी पितृ दोष का कारण हो सकता है।
    अचानक से घर के सदस्यों का बीमार होना। सही इलाज कराने के बाद भी बीमारी का ठीक ना होना भी इसका लक्षण है। शारीरिक व मानसिक रूप से व्यक्ति परेशान रहने लगता है।
  5. शादी के बाद कई उपाय करने के बाद भी संतान सुख से वंचित रहना या फिर जो संतान पैदा हुई वह मंदबुद्धि या विकलांग पैदा होना। इतना ही नहीं पितृ दोष के चलते संतान पैदा होने के तुरंत बाद ही मृत्यु हो जाती है।
  6. नीम या पीपल के पेड़ को कटवाने पर या किसी सांप को मार देने के बाद भी पितृ दोष का सामना करना पड़ता है। घर में अकस्मात कोई बड़ी दुर्घटना हो जाना यह समझाने के लिए काफी है कि पितर नाराज हैं।
  7. अगर पितृ दोष है तो जातक की पढ़ाई में बाधा आयेगी। परीक्षाफल आशानुरूप नहीं होगा। परीक्षा में फेल होने तक की स्थिति आ जाती है।

पितृ दोष के प्रकार | पितृ दोष क्यों होता है | Pitradosha Ke Prakar

  • पितृ दोष कई प्रकार के होते है। ज्योतिष में बताया गया है कि पितृदोष दो ग्रह सूर्य व मंगल के चलते होता है। सूर्य का संबंध पिता से व मंगल का संबंध रक्त से होता है। जब सूर्य की राहु व केतु के साथ दृष्टि या युति होते है तो सूर्यकृत पितृ दोष बनता है। यदि मंगल राहु या केतु के साथ युति बना रहा हो तो मंगल पितृ दोष बनता है। सूर्यकृत पितृदोष होने से जातक के अपने परिवार वालो से नहीं बनती है। लड़ाई-झगड़े का माहौल बना रहता है। घर में आर्थिक व सामाजिक परेशानियां चलती रहती है। वहीं मंगल पितृदोष होने से जातक की अपने परिवार में अपने से छोटे लोगों के साथ तालमेल नहीं बनता है, कहासुनी लगी रहती है।
  • पूर्व जन्म के कर्मो के आधार पर भी पितृ दोष का सामना करना पड़ता है। व्यक्ति अपने कर्मों से भी पितृदोष निर्मित कर लेता है। यदि पूर्व जन्म में किसी स्त्री का अपमान किया है, उसके साथ दुव्र्यवहार किया है तो इस जन्म में स्त्री पितृ दोष का सामना करना पड़ता है। शादी की उम्र हो जाने के बाद भी शादी न होना, शादी होने के बाद दाम्पत्य जीवन में सुख का अभाव, लड़ाई-झगड़ा होना, विवाद के चलते तलाक तक बात पहुंच जाना यह सभी स्त्री पितृ दोष के लक्षण है।
  • लाल किताब के अनुसार यदि किसी जातक की कुंडली के दशवे भाव में गुरू हो या गुरु ग्रह पर दो बुरे ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो या नीच राशि में हो तो यह पितर दोष पिछले कई पूर्व जन्मों से माना जाता है जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है।
  • यदि कुंडली में राहु सूर्य अथवा चंद्रमा के साथ हो या गुरु चांडाल योग बन रहा हो या फिर कुंडली में केंद्र का स्थान रिक्त हो तब भी कुंडली में पितृ दोष होता है।
  • माता-पिता की सेवा न करना या उनकी अवहेलना करने से पितृ दोष की समस्या हो सकती है। इसके साथ ही आपने अपनी क्षमता का दुरुपयोग किया है तो भी कुंडली में पितृ दोष की आशंका बढ़ जाती है।
  • पितृ दोष को हम कई प्रकार से जान सकते है, जैसे हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के, पिता का, भाई का, बहन का, मां का, पत्नी का, बेटी और बेटे का।
  • जब कोई जातक अपने जातक पूर्व जन्म में किसी धर्म की अवहेलना करता है, धर्म विरोधी कार्य करता है तथा इस जन्म में अपने इसी व्यवहार बार-बार दोहराता है तो पितृ दोष अपने आप निर्मित हो जाता है।

पितृ दोष के उपाय | पितृ दोष निवारण के सरल उपाय | Pitra Dosh Nivaran Ke Saral Upay

  • पितृ हमशों क्यों नाराज रहते है। जब वे देखते है कि उनके ही खून उनकी अनदेखी कर रहे है तो पितर पिशाच योनि में पहुंचकर आपको परेशान करने लगते हैं। ऐसे में पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए कुछ उपाय करना जरूरी होता है। इन उपायों को करके आप पितृ दोष को दूर कर सकते है। अब हम इन उपायों को ही जानेंगे-
  • हर माह पड़ने वाली अमावस्या को पितरों के निर्मित दान, तर्पण करने का महत्व है। ऐसे में सोमवती अमावस्या यानि कि जिस अमावस्या के दिन सोमवार हो उस दिन पीपल के पेड़ के नीचे जनेऊ चढ़ाइए और एक जनेऊ भगवान श्री हरि विष्णु भगवान के नाम का उसी पीपल के पेड़ पर चढ़ा दीजिए। पीपल के पेड़ की एक सौ आठ बार परिक्रमा कीजिए और भगवान विष्णु का ध्यान करके उनसे प्रार्थना कीजिए। इस बात का ध्यान रखिए कि हर परिक्रमा के बाद एक मिठाई का टुकड़ा पीपल के पेड़ पर अवश्य चढ़एं। परिक्रमा के दौरान भगवान विष्णु के शक्तिशाली मंत्र:ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय‘‘ का निरन्तर जाप करते रहे। परिक्रमा पूरी करने के बाद फिर से पीपल के पेड और भगवान श्री हरि विष्णु जी से प्रार्थना कीजिये और जाने-अन्जाने में हुए अपराधों की माफी मांगिए। ऐसा करने से दोष दूर होता है क्योंकि पीपल में भी भगवान का वास होता है। पीपल के पेड़ पर शनिवार को दीपक जलाना और जल चढ़ाने से भी दोष दूर होता है।
  • शनिवार के दिन कौओं और मछलियों को घी मिला चावल खिलाईये। उनको नियम से दाना डालिए।
  • अपने घर में पितरों की फोटो को हमेशा दक्षिण दिशा में लगाना चाहिए। किसी और दिशा में फोटो लगाने से उनके कोपभाजन का सामना करना पड़ता हे इसलिए हमेशा ध्यान रखे कि पितरो की फोटो दक्षिण दिशा में लगाएं और उस पर माला चढ़ाएं। नियम से पितरो की फोटो के समक्ष धूपबत्ती अवश्य करें। हर रोज दक्षिण दिशा की तरफ एक दीपक जलाएं। हर रोज जब भी अपने काम पर जाये तो पितरो की फोटो के समक्ष प्रणाम करके घर से निकले। सकुशल घर वापस आने पर पितरो को धन्यवाद अवश्य दे। किसी यात्रा पर जाने से पहले भी उनका आर्शीवाद लेना ना भूले।
  • पितृ दोष के चलते यदि किसी जातक के विवाह में बाधा आ रही हो तो उस जातक को गरीब कन्याओं का सामूहिक विवाह करवाना चाहिए। ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते है और जातक के विवाह में आ रही बाधा दूर होती है।
  • हर साल जिस दिन पितर गोकुलवासी हुए हो उस दिन श्राद्ध पक्ष में उनका नियमपूर्वक श्राद्ध करने, ब्राह्मण को भोज कराने और श्रद्धापूर्वक दान देने से पितर प्रसन्न होते है और चली आ रही परेशानी दूर होती है। अगर आपको अपने पितरो की मृत्यु तिथि ना मालूम हो तो अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण कर सकते हैं। अमावस्या के दिन गरीबों को दान दक्षिणा अवश्य देना चाहिए। यह प्रयास करना चाहिए कि उस दिन घर के दरवाजे अगर कोई भूखा आये तो वह भूखा ना जाये। अगर रोज यह उपाय नहीं कर सकते तो पितृ पक्ष के दौरान तो इस उपाय को अवश्य करें।
  • सूर्योदय के समय भगवान सूर्य देव को जल अर्पित करते समय गायत्री मंत्र का जाप करें। गाय को गुड़ खिलाएं।
  • पितृ पक्ष के दौरान नारायणबलि पूजा और पितृ गायत्री का अनुष्ठान करवाएं। इस दौरान पितृ दोष निवारण मंत्र का जाप अवश्य करें। यह मंत्र है-

ऊँ सर्व पितृ देवताभ्ये नमः प्रथम पितृ नाराणाय नमः नमो भगवते वासुदेवाय नमः

  • सोमवार के दिन आक के पुष्पों से भगवान भोले शंकर की पूजा आराधना करें। शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और भगवान भोलेनाथ के महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
  • मंगल यंत्र को स्थापित करें और नियम से उसकी पूजा करें।
  • पितृ कर्म के लिए वर्ष भर में 12 मृत्यु तिथि, 12 अमावस्या, 12 पूर्णिमा, 12 संक्रांति, 12 वैधृति योग, 24 एकादशी व श्राद्ध के 15 दिन मिलाकर 99 दिन होते हैं। इन दिनों में पितृ के निर्मित पूजा-पाठ करना चाहिए।
  • पितृ दोष के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान भोलेनाथ की मूर्ति के समक्ष खड़े होकर “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात
  • मंत्र का अधिक से अधिक बार जाप करें। अपने पितरों की मुक्ति के लिए श्रद्धापूर्ण ढंग से ईश्वर से प्रार्थना करें।

पितृ दोष हो तो भूलकर भी या न करें |

  • पितृ पूजा में भूलकर भी स्टील, लोहा, प्लास्टिक, शीशे के बर्तन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पितृ पक्ष वाले दिन ब्राहमण को सात्विक भोजन ही करना चाहिए। भूलकर भी पितरों के भोजन में प्याज, लहसुन या मांस-मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • पितृ पक्ष के दौरान अपने घर के बड़े-बुजुर्गो का सम्मान करना चाहिए। भूलकर भी उनका अपमान न करें। उनकी आज्ञा की अवहेलना न करें।

निष्कर्ष

पितरों को कभी नाराज नहीं करना चाहिए। अगर पितृ प्रसन्न होंगे तो हमारे जीवन में कोई भी परेशानी नहीं होगी। बड़ी से बड़ी बाधा भी उनके आर्शीवाद से दूर हो जाती है। आज हमने पितृ दोष क्या है, इसको दूर करने के क्या उपाय आदि पर विस्तारपूर्वक एक सारगर्भित लेख आपके सामने प्रस्तुत किया। आशा करते है यह लेख आपको अच्छा लगा होगा। अगर यह लेख आपको अच्छे लगा तो इसे अपने दोस्तों, परिजनों के साथ सोशल मीड़िया पर शेयर जरूर करें। ऐसे ही धार्मिक लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे।

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महाकालेश्वर की अनोखी है महिमा, जानिए महाकाल के बारे में सभी कुछ

हिन्दू धर्म में बहुत सारे प्राचीन मंदिर और तीर्थ स्थान है। इन तीर्थ स्थानों में भोलेनाथ के शिवालयों की महिमा अपरम्पार है। देश भर में भोलेनाथ के मंदिरों और शिवालयों की संख्या लाखों में है। इन्हीं शिवालयों में भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंग भी आते है। ये ज्योतिर्लिंग देश के अनेक राज्यों में स्थापित है। इन सभी ज्योतिर्लिंगों का अपना-अपना महत्व है। मान्यता है कि इन ज्योतिर्लिगों में भगवान शिव ज्योति के रूप में विद्यमान है। इन्हीं ज्योतिर्लिगों में से एक है भोलेनाथ का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Mahakaleshwar Jyotirlinga) । महाकाल का ज्योतिर्लिंग एक स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है अर्थात यह शिवलिंग स्वयं उत्पन्न हुआ है। आज के लेख में हम भोलेनाथ के इसी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की महिमा, इसका इतिहास, दर्शन के नियम आदि के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे।

महाकाल मंदिर कहां है | Mahakal Mandir Kaha Sthit Hai

मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में क्षिप्रा नदी के तट पर भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। इसकी इंदौर से दूरी 50 किमी और भोपाल से लगभग 300 किमी है। इस मंदिर की भस्म आरती समस्त विश्व में विख्यात है। इस मंदिर में रोजाना देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान महाकाल के दर्शन को आते है। कहा जाता है कि काल उसका क्या करें जो भक्त हो महाकाल का। यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज होते है। ऐसे में दक्षिण मुखी होने के चलते देवों के देव महाकाल के दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

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महाकाल मंदिर का इतिहास | Mahakal Mandir History | महाकाल की उत्पत्ति कैसे हुई

महाकाल मंदिर के इतिहास के बारे में सही-सही जानकारी मौजूद नहीं है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि महाकाल मंदिर की स्थापना द्वापर युग में हुई थी। भगवान श्रीकृष्ण का पालन पोषण करने वाले पिता नंद जी के आठ पीढ़ी पूर्व इस मंदिर की स्थापना होने की बात कही जाती है। शिवपुराण में भी इस ज्योतिर्लिंग के बारे में बताया गया है। इसके अनुसार इसकी स्थापना गोप नामक बालक ने की। मुगलों और ब्रिटिश शासन के अधीन रहते हुए भी इस सनातन मंदिर ने अपनी पहचान नहीं खोई।

14वीं और 15 वीं समय के प्राचीन ग्रंथों में भी इस मंदिर के बारे में जानकारी मिलती हैं। 18वीं सदी के चैथे दशक ने मराठा राजा पेशवा ने उज्जैन पर शासन करने के लिए अपने सरदार रणजी शिंदे को जिम्मेदारी दी। रणजी शिंदे ने 18वीं सदी के पांचवे दशक में इस मदिर का पुर्नरत्थान किया था। वर्तमान समय में महाकाल मंदिर का जो स्वरूप है वह रणजी शिंदे द्वारा ही बनवाया हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने महाकाल कारिडोर का निर्माण कराकर इसे एक नये स्वरूप दे दिया है।

महाकाल मंदिर का स्वरूप | Ujjain Mahakal Ka Mandir Kaisa Hai

पुरातन समय में महाकाल मंदिर 2 हेक्टेयर में स्थित था। इसका पुननिर्माण करके इसके परिसर को बढ़ाकर 20 हेक्टेयर कर दिया गया है। महाकाल मंदिर का प्रवेश द्वार काफी बड़ा और विशाल है। मंदिर के पीछे की तरफ रूद्रसागर स्थित है जहां पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थित है। रूद्रसागर के चारो तरफ ऊँची-ऊँची दीवारे है। इन दीवारों पर म्यूरल बनाएं गये है जो कि पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहते है। महाकाल मंदिर का मुख्य भाग तीन भागों में बंटा हुआ है। सबसे नीचे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। मध्य में ओकांरेश्वर शिवलिंग है जबकि सबसे ऊपर की तरफ नागचंद्रेश्वर मंदिर है जिसके दर्शन सिर्फ नागपंचमी के दिन हो सकते है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान महाकालेश्वर का बहुत बड़ा दक्षिणमुखी शिवलिंग है। गर्भगृह में ही माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की बहुत ही सुन्दर प्रतिमाएं मौजूद हैं। गर्भगृह में ही नंदी दीप स्थापित है, जो हमेशा जलता होता रहता है। नंदी जी की प्रतिमा गर्भगृह के ठीक सामने मौजूद है।

महाकाल मंदिर को पृथ्वी का केन्द्र बिन्दु भी कहते है क्योंकि कर्क रेखा महाकाल मंदिर के शिवलिंग के ऊपर से निकलती है। मंदिर में शिव लीलाओं का वर्णन करती करीब 200 से अधिक मूर्तियां है।

महाकालेश्वर विषयक एक श्लोक प्रसिद्ध है-

‘आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।‘

इसका मतलब है कि आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही सबसे मान्य शिवलिंग है।

महाशिवरात्रि पर्व से पहले ही समूचा उज्जैन शहर शिवमय हो जाता है। महाशिवरात्रि पर देश व विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन को आते है और उनका आशीष पाते है। महाशिवरात्रि से ठीक पहले शिव पार्वती का श्रृंगार किया जाता है। शिवलिंग पर चंदन और भांग चढ़ाया जाता है। माता पार्वती को मेंहदी लगाई जाती है। महाशिवरात्रि वाले दिन शिव बारात निकाली जाती है। भगवान महाकाल दूल्हे की पोशाक में रहते है और माता पार्वती को दुल्हन के रूप में सजाया जाता है। महाशिवरात्रि पर मंदिर में भक्तों के लिए खास इंतजाम किये जाते है। जगह-जगह भंडारा होता है, ठंडाई पीकर महाकाल के भक्त झूमते नाचते गाते है।

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महाकाल मंदिर के दर्शन के नियम | Mahakal Ujjain Mandir Ke Niyam | Ujjain Mahakal Darshan

महाकाल मंदिर में रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते है। इसलिए मंदिर प्रशासन ने महाकाल के दर्शन के लिए नियम बनाएं है। इन नियमों के तहत ही आपको मंदिर में दर्शन मिलते है।

सबसे पहले दर्शन फ्री वाले दर्शन होते है। इस दर्शन में आपको कुछ खर्च नहीं करना पड़ता है। चूंकि यह दर्शन फ्री के होते है इसलिए इसमें लंबी-लंबी लाइन लगती है। आपको महाकाल के दर्शन करने के लिए लगभग डेढ़ से दो घंटे का समय लग जाता है। इसमें शिवलिंग के दर्शन दूर से ही हो पाते हैं।

दूसरे प्रकार के दर्शन 250 रू0 खर्च करके होते हैं। इसमें भक्तों की इंट्री महाकाल मंदिर के दूसरे गेट से होती है। इसमें भीड़ कम होती है जिसके चलते आपको शीघ्र दर्शन हो जाते हैं।

तीसरे प्रकार के दर्शन वह होते है जिसमें आपको महाकाल की सुबह 4 बजे की भस्म आरती के दर्शन होते हैं। महाकाल मंदिर में रोज सुबह 4 बजे भगवान शिव का शमशान की राख से अभिषेक करने के बाद आरती की जाती है जिसे भस्म आरती हैं। भस्म आरती में सिर्फ पुरूषों को ही प्रवेश दिया जाता है। भस्म आरती में भाग लेने का बाद अगर आप शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहते हैं तो इसके लिए मंदिर प्रशासन द्वारा तय की गई ड्रेस को आपको फालो करना होगा। इसके लिए आपको धोती-कुर्ता पहनना जरूरी है।

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महाकाल मंदिर दर्शन ऑनलाइन बुकिंग | Mahakal Darshan Booking Online | Mahakaleshwar Darshan Booking

भस्म आरती में भाग लेने के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से रजिस्ट्रेशन होता है। इसकी ऑनलाइन बुकिंग आप महाकालेश्वर की औफिशियल वेबसाइट पर जाकर निर्धारित शुल्क जमा कर इसमें भाग ले सकते है। आफलाइन बुकिंग के लिए कोई शुल्क नहीं है। इसके लिए कई काउंटर बनाये गये है जो सुबह 7 बजे खुलते हैं। भस्म आरती में शामिल होने के लिए आपको 1 दिन पहले ही टिकट लेना होता है। चैथे प्रकार के दर्शनों के लिए आपको 1500 रू0 खर्च करने पड़ेगे। यह धनराशि खर्च करके आप मंदिर के गर्भगृह में जाकर शिवलिंग पर फूल, माला चढ़ाने के साथ ही आप शिवलिंग का अभिषेक भी कर सकते है।

महाकालेश्वर मंदिर औफिशियल वेबसाइट : https://shrimahakaleshwar.com/

महाकाल मंदिर लाइव दर्शन | Mahakal Mandir Live Darshan

अगर आप उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने अभी नहीं जा सकते तो आप इनके ऑनलाइन दर्शन भी कर सकते हैं. अगर आपके मन में सच्ची श्रद्धा है तो आपको ऑनलाइन दर्शन करके भी बहुत प्रसन्नता होगी.

महाकाल मंदिर के लाइव दर्शन करने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा | Mahakaleshwar Jyotirlinga Story in Hindi

महाकालेश्वर से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार उज्जयिनी नगर (वर्तमान में उज्जैन) नगर में एक ब्राहमण रहता था। वह ब्राहमण शिव जी का प्राकन्ण भक्त था। हर रोज वह शिव जी की पूजा-आराधना किया करता था। इसी नगर में दूषण नाम का राक्षस रहता था। दूषण शिव भक्तों को परेशान करता था, उनकी पूजा आराधना में विघ्न डालता था। दूषण से परेशान होकर सभी शिव भक्तों ने भगवान शिव के सम्मुख गुहार लगाई। अपने भक्तों की पुकार सुनकर भगवान शिव ने दूषण से ऐसा करने को मना किया लेकिन राक्षसी प्रवृत्ति दूषण ने उनकी बात नहीं मानी और वह ब्राहमणों पर आक्रमण कर दिया। दूषण के इस कृत्य को देखकर भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गए। धरती फाड़कर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने दूषण का वध कर दिया। पुराणों में वर्णित है कि जिस स्थान पर भोलेनाथ प्रकट हुए उसी स्थान पर वह ज्योति के रूप में उनका शिवलिंग स्थापित हो गया।

महाकाल मंदिर की आरती | Mahakal Bhasma Aarti Time | भस्म आरती में क्या होता है?

महाकाल मंदिर में रोजाना सुबह 4 बजे भस्म आरती होती है। कुछ सालों पहले तक शमशान की राख से महाकाल का श्रंगार किया जाता है, हालांकि अब इसमें बदलाव किया गया है। अब कपिला गाय के गोबर के बने कंडो, शमी, पीपल, पलाश आदि की लकड़ियों को जलाकर भस्म तैयार की जाती है। भस्म आरती को देखना हर किसी के नसीब में नहीं होता है, केवल कुछ भाग्यशाली भक्तों को ही इसके दर्शन हो पाते है। भस्म आरती में सिर्फ पुरूष ही भाग ले सकते हैं। महिलाओं को इस आरती को देखने की मनाही है उन्हें भस्म आरती के समय घूंघट ओढ़ना पड़ता है। आरती के समय पुजारी सिर्फ धोती पहनता है और कोई भी वस्त्र पहनना वर्जित होता है। भस्म आरती के पीछे मान्यता है कि भोलेनाथ शमशान के साधक है जिसके चलते भस्म से उनका श्रृंगार किया जाता है। भस्म आरती की भस्म में इतनी शक्ति होती है कि बड़े से बड़ा रोग भी यहां की भस्म से दूर हो जाता है।

भस्म आरती के बाद सुबह 7ः30 बजे दत्योदक आरती होती है जिसमें मंदिर के पुजारी भगवान महाकाल का अनोखा श्रृंगार करते है। दत्योदक आरती के बाद भोलेनाथ को दही चावल का भोग लगाया जाता है। दत्योदक आरती के बाद सुबह 10ः30 बजे महाभोग आरती होती है जिसमें मंदिर प्रशासन द्वारा बनाया गया भोग मंदिर के पुजारी भगवान महाकाल को चढ़ाते है। महाभोग आरती के बाद शाम को 5 से 6 बजे के बीच महाकाल की संध्या होती है। शाम 7ः30 बजे एक बार फिर से संध्या आरती के बाद पुजारी महाकाल का आकर्षक श्रृंगार करते है। इसके बाद महाकाल बाबा विश्राम करते हैं। रात्रि 10ः30 बजे से आधे घंटे तक बाबा की शयन आरती होती है। इस आरती के समय भगवान महाकाल को गुलाब के फूलों से सजाया जाता है।

काल भैरव का दर्शन करना जरूरी

महाकाल में भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा की जाती है। शिव के इस स्वरूप को काल भैरव के नाम से जाना जाता है। महाकाल के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करने चाहिए। काल भैरव को उज्जैन का सेनापति कहा जाता है। इसलिए राजा महाकाल के दर्शन करने से पहले सेनापति काल भैरव के दर्शन करना जरूरी होता है। जो भक्त भैरवगढ़ स्थित काल भैरव के मंदिर में बाबा काल भैरव के दर्शन करता है उसके सभी पाप मिट जाते है। उसकी मनोवांछित मनोकामना पूरी होती है। इस मंदिर में बाबा काल भैरव को मदिरा का प्रसाद चढ़ता है। एक प्लेट में मदिरा डालकर काल भैरव के मुख के पास ले जाई जाती है और आश्चर्यजनक रूप से सारी प्लेट की मदिरा खत्म हो जाती है। यह बाबा का चमत्कार से ज्यादा कुछ नहीं है।

उज्जैन महाकाल मंदिर कैसे जाएं? | Ujjain Mahakal Mandir Kaise Jaye

महाकाल में दर्शनों के लिए आप एयरपोर्ट, ट्रेन, बस या स्वयं के साधन से जा सकते हैं। हवाई जहाज से यात्रा के लिए आपको अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डे पर उतरना होगा। यहां से महाकाल मंदिर की दूरी तकरीबन 57 किमी है। यहां उतरकर आप महाकाल मंदिर के लिए कोई बस या टैक्सी पकड़कर वहां पहुंच सकते है।

अगर आप ट्रेन से महाकाल जाना चाहते हैं तो अपने शहर से उज्जैन के लिए ट्रेन पकड़े। देश के लगभग सभी बड़े शहरों लखनऊ, दिल्ली, मुम्बई से यहां के लिए ट्रेन मिलती है। दिल्ली से उज्जैन का किराया 1500 रू0 के आसपास है। उज्जैन से महाकाल मंदिर की दूरी लगभग 2 किमी है। उज्जैन पहुंचकर आप कैब पकड़कर महाकाल पहुंच सकते हैं। अगर आपके शहर से उज्जैन के लिए ट्रेन न मिले तो आप इंदौर के लिए ट्रेन पकड़ लें। इंदौर पहुंचकर वहां से बस द्वारा महाकाल जा सकते है।

आप सड़क द्वारा अपने निजी वाहन से भी महाकाल पहुंच सकते है। दिल्ली से उज्जैन जाने की दूरी करीब 831 किमी है यहां पहुचने के लिए आपको लगभग 15 घंटे लगेंगे। इसके लिए आपको नेशनल हाईवे 48 और 52 पकड़ना होगा।

इनके दर्शन भी जरूरी | Mahakal Mandir Me Inke Darshan Bhi Kare

मंदिरों की नगरी उज्जैन में आप ना सिर्फ महाकाल के दर्शन करें। इसके अलावा शक्ति की देवी माता हरीसिद्धी माता के दर्शन भी अवश्य करने चाहिए। हरिसिद्धी माता का यहां पर शक्तिपीठ है। मान्यता है कि माता हरसिद्धी के दर पे जो भी भक्त सच्चे मन से मांगता है, माता उसकी मनोकामना पूरी करती है। माता हर कार्य को सिद्ध करनी वाली माता है।

उज्जैन में स्थित महाकाल भगवान शिव का पवित्र धाम है। इस दर से कोई भी भक्त निराश नहीं होता है। महाकाल की भस्म आरती समूचे विश्व में विख्यात है।

तो दोस्तों आज के लेख में हमने आपको देवों के देव महादेव के पावन धाम महाकाल के बारे में संपूर्ण जानकारी प्रदान की। उम्मीद करते है यह जानकारी आपको पसंद आई होगी। इस जानकारी को अपने परिजनों, दोस्तों के साथ साझा अवश्य करें। हम आगे भी आपको देश भर के सभी मंदिरों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते रहेंगे। आप हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे। जयश्रीराम

ज्यादातर पूछे जाने वाले प्रश्न – FAQ

Q.1. महाकाल मंदिर कहां स्थित है?

Ans. महाकाल मंदिर मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक यह ही अकेला ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। इस मंदिर में तांत्रिक पूजा भी होती है।

Q.2. महाकाल मंदिर में क्या प्रसिद्ध है

Ans. महाकाल मंदिर की भस्म आरती समूचे विश्व में विख्यात है। यह आरती सुबह 4 बजे होती है। इस आरती में भाग लेने के लिए पुरूषों को धोती-कुर्ता धारण करना होता है। हालांकि महिलाओं को इस आरती को देखने की मनाही है। उन्हें इस समय घूंघट करना पड़ता है।

Q.3. महाकाल मंदिर के सामने से बारात क्यों नहीं निकलती है?

Ans. महाकाल उज्जैन के राजा कहलाते है। राजा के सामने से कोई भी घोड़े पर सवार होकर नहीं निकल सकता।

Q.4. क्या काल भैरव का दर्शन करना जरूरी है?

Ans. काल भैरव को महाकाल का सेनापति कहा जाता है। ऐसे में महाकाल राजा के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करना जरूरी होता है। काल भैरव के दर्शन के बिना महाकाल की यात्रा अधूरी रहती है।

Q.5. महाकाल की यात्रा कैसे करें?

Ans. महाकाल जाने के लिए आप ट्रेन, हवाई जहाज, सड़क मार्ग से जा सकते है। देश के सभी स्थानों से महाकाल के लिए सुविधा उपलब्ध है।
है महिमा, जानिए महाकाल के बारे में सभी कुछ

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पापमोचिनी एकादशी व्रत कथा | Papamochani Ekadashi in Hindi

सभी पापों को नष्ट करता है पापमोचिनी एकादशी का व्रत, जाने व्रत की पूरी विधि व कथा

हिन्दू धर्म में व्रत, उपवास का बहुत अधिक महत्व है। व्रत को रखने के पीछे आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दोनों कारण होते हैं। व्रत रखने से शरीर स्वस्थ और मन शांत होता है। अलग-अलग तिथियों पर अलग-अलग व्रतों को रखने की परंपरा है। हर व्रत का अलग-अलग महत्व भी होता है। इन्हीं व्रतों में से एक है एकादशी का व्रत। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। हर माह में दो एकादशी पड़ती है एक कृष्ण पक्ष में तो दूसरी शुक्ल पक्ष में। चैत्र मास का प्रारम्भ 8 मार्च से हो चुका है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहा जाता है। साल भर में पड़ने वाली 24 एकादशियों में पापमोचिनी एकादशी अंतिम होती है। पापमोचिनी एकादशी के दिन श्री हरि भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने और व्रत का पालन करने वाले जातक को जाने-अंजाने किये गये सभी पापों से मुक्ति मिलती है। आज के लेख में हम जानेंगे कि चैत्र मास में पापमोचिनी एकादशी कब है, कैसे इस दिन पूजा पाठ करना चाहिए और पापमोचिनी एकादशी का क्या महत्व है आदि के बारे में विस्तार से जानेंगे।

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पापमोचिनी एकादशी कब है | Papamochani Ekadashi Kab Hai 2023

पापमोचिनी एकादशी 18 मार्च, 2023 दिन शनिवार को पड़ेगी। पापमोचिनी एकादशी तिथि का आरंभ 17 मार्च रात्रि 11 बजकर 15 मिनट से प्रारंभ होकर 18 मार्च, दिन शनिवार को 11 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। हिन्दू धर्म में हर तिथि को करने से पहले उदया तिथि का मान किया जाता है। ऐसे में पापमोचिनी एकादशी का व्रत दिनांक 18 मार्च को करना ही श्रेयस्कर होगा। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी को किया जाता है। ऐसे में पारण 19 मार्च, दिन रविवार को करना चाहिए। पारण सुबह के समय ही करना चाहिए। पारण का शुभ समय दिनांक 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 30 मिनट से 9 बजकर 27 मिनट है।

पापमोचिनी एकादशी पर ऐसे करे पूजा | Papamochani Ekadashi Puja Vidhi

पापमोचिनी एकादशी के दिन प्रातःकाल ब्रहम मुहूर्त में उठ जाएं। इसके बाद पवित्र नदियों का ध्यान करते हुए स्नान कर लें। स्नान के बाद साफ वस्त्र पहन लें। ध्यान रखे जो भी वस्त्र आप धारण करें वह पीले या लाल हो। कभी भी काले वस्त्रों को धारण करके पूजा नहीं करनी चाहिए। अपने पूजा स्थल की पर्याप्त रूप से साफ-सफाई करने के बाद वहां पर भगवान श्री हरि विष्णु जी की तस्वीर स्थापित करें और उनके समक्ष बैठकर एकादशी के व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु को पीले फूल चढ़ाएं। श्री हरि भगवान विष्णु के सम्मुख देशी घी का दीपक जलाएं। पवित्र श्रीमद्भागवत गीता के ग्यारहवें अध्यान का पाठ करें। पूजा के दौरान पूरे समय भगवान विष्णु के पवित्र मंत्र ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करते रहें। पापमोचिनी एकादशी की कथा करें। तत्पश्चात भगवान विष्णु की आरती करें। केले के पेड़ में जल दें। पूजन समाप्त होने के बाद सूर्य को अघ्र्य देना ना भूले। ऐसा करने से भगवान सूर्य और भगवान विष्णु दोनों का आर्शीवाद प्राप्त होता है। एकादशी के व्रत में भगवान विष्णु को जो भी भोग लगाये उसमें तुलसी दल को जरूर डाले लेकिन ध्यान रहे कि कभी भी एकादशी के दिन तुलसी को ना तोड़े। तुलसी जी को दशमी के दिन ही तोड़ ले। आज के दिन भगवान श्री हरि विष्णु जी के चतुर्भुज रूप का दर्शन करना सर्वोत्तम होता है।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा | Papamochani Ekadashi Vrat Katha | Papamochani Ekadashi Story in Hindi

पापमोचिनी एकादशी की एक पुराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में चितस्थ नामक रमणिक वन में इंद्र देव, देवताओं और अप्सराओं के साथ भ्रमण कर रहे थे। वहीं पर मेधावी नाम के ऋषि भी कठोर तपस्या कर रहे थे। मेधावी ऋषि शिव जी के परम भक्त था। अप्सराएं अनुचरी थी वे देवताओं द्वारा किये भी उचित-अनुचित कार्य को करती थी। एक बार की बात है प्रेम के देवता कामदेव ने मंजूघोषा नाम की अप्सरा को ऋषि की तपस्या भंग करने की जिम्मेदारी सौंपी।

मंजूघोषा ने ऋषियों के सामने अपनी मुद्राओं, हाव भाव व कलाओं से अपनी ओर मोहित करने का प्रयास किया। अप्सरा की इन कामुक मुद्राओं से ऋषियों की तपस्या में कोई भंग नहीं पड़ा। इन्हीं ऋषियों में कुछ ऋषि ऐसे भी थे जो किशोरावस्था की दहलीज पर थे। वह अप्सरा की भाव-भंगिमाओं पर मोहित हो गए और रति क्रीडा में लीन हो गए। ऋषि और अप्सराओं को काम क्रीडा करते हुए 57 साल बीत गये। एक दिन मंजूघोषा अप्सरा ने ऋषि के सम्मुख वापस देवलोक जाने की इच्छा रखी। ऋषि को इस बात का एहसास हो गया कि अंजाने में उससे कितना बड़ा अपराध हो गया। उसे इस बात का आत्मज्ञान हो गया कि उससे यह घृणित काम अप्सरा मंजूघोषा के कारण ही हुआ। ऋषि पुत्र क्रोधित हो गया और क्रोध में आकर उसने मंजूघोषा को पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। ऋषि पुत्र के श्राप से अप्सरा दुखी हो गई। उसने ऋषि से इस योनि से मुक्ति का उपाय पूछा। अप्सरा की करुण व्यथा से ऋषि पुत्र का हृदय पिघल गया। ऋषि पुत्र ने अप्सरा को पापमोचनी एकादशी का व्रत करने को कहा। अप्सरा मंजुघोष ने ऋषि पुत्र की आज्ञानुसार पापमोचनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत के प्रभाव अप्सरा पिशाच योनि से मुक्त होकर देवलोक में वापस चली गई। जो भी व्यक्ति पापमोचनी एकादशी का विधिपूर्वक पूजन व व्रत करता है, उसे उसके सभी पापो से मुक्ति मिलती है । साथ ही उसे उसके सारे संकटों से छुटकारा मिलता है और मृत्यु उपरांत मोक्ष फल की प्राप्ति होती है।

पापमोचनी एकादशी का महत्व | Papamochani Ekadashi Ka Mahatva

पापमोचनी एकादशी के महत्व के बारे में भविष्योत्तर पुराण और हरिवासर पुराण में उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी जातक सच्ची श्रद्धा से पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसे 1000 गाय दान करने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पापमोचनी एकादशी का व्रत संतान सुख प्रदान करने वाला व्रत हैं। इस व्रत के प्रभाव से निःसंतान दंपति को संतान सुख की प्राप्ति होती है। जातक के घर में सुख समृद्धि बढ़ती है। जातक को सभी प्रकार के सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है।

पापमोचिनी एकादशी व्रत के नियम | Papamochani Ekadashi Vrat Ki Niyam

पापमोचिनी एकादशी के व्रत को आप दो तरह से रख सकते हैं जिसमें से पहला है निर्जल। इसके तहत उपासक को व्रत के दौरान पानी का सेवन नहीं करना होता है, जिसके चलते इसे सिर्फ स्वस्थ व्यक्तियों को ही रखने की सलाह दी जाती है. वहीं पर दूसरा तरीका फलाहार या जलीय व्रत का है जिसमें सिर्फ फलाहार या फिर पानी पीने की छूट होती है. सामान्य लोगों को इसी तरीके से व्रत रखने की सलाह दी जाती है.

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क्या न करें इस दिन | Papamochani Ekadashi Ke Din Kya Na Kare

पापमोचिनी एकादशी के दिन तामसिक भोजन, प्याज, लहसुन, मास मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।

आज के दिन महिलाओं को बाल नहीं धोना चाहिए। न ही आज के दिन बालों में तेल लगाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि एकादशी के दिन जो महिलाएं बाल धोती है उनके घर में कलह क्लेश का वातावरण बना रहता है। घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर जाती है। परिवार में लड़ाई झगड़े बढ़ते है, घर में लक्ष्मी की हानि होती है।

आज के दिन सुबह देर तक तक नहीं सोना चाहिए, ब्रहम मुहूर्त में ही उठ जाना चाहिए। अगर आप देर तक सोते है तो आपके घर में दरिद्रता का वास हो जाता है।

एकादशी के दिन ब्रहमचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए। पति-पत्नी को आपस में संबंध नहीं बनाना चाहिए। मान्यता है कि अगर आज दंपत्ति संबंध बनाते है तो उससे संतान होती है तो संतान का जीवन दुखदायी रहता है।

एकादशी के दिन दोपहर के समय कभी भी नहीं सोना चाहिए। अगर आप दोपहर में सो जाते है तो आपके घर में दरिद्रता आती है।

सारांश

पापमोचिनी एकदाशी का व्रत ररखने वाले जातक के मन में एकाग्रता आती है और मन शांत रहता है. इसके साथ ही धन, आरोग्य और संतान की प्राप्ति के लिए भी पापमोचिनी एकादशी का व्रत सर्वोत्तम हैं। . इस व्रत को रखने से व्यक्ति को मानसिक शांति भी मिलती है। पापमोचिनी एकादशी का व्रत रखने वाले जातक से जाने-अंजाने में किये गये पापों से मुक्ति मिलती है। तो दोस्तों यह थी पापमोचिनी एकादशी के व्रत के बारे में पूरी जानकारी। उम्मीद करते हैं कि हमारे पिछले लेखों की तरह आपको यह लेख भी पसंद आयेगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों, परिजनों के साथ सोशल मीडिया पर साझा जरूर करें। इसी तरह के धार्मिक व अध्यात्मिक लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे। जयश्रीराम।

FAQ | ज्यादातर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q. पापमोचिनी एकादशी कब है?

Ans. पापमोचिनी एकादशी 17 मार्च, को ही लग जायेगी लेकिन उदया तिथि के मान के चलते पापमोचिनी एकादशी का व्रत व पूजन दिनांक 18 मार्च दिन शनिवार को ही करना सर्वोत्तम होगा।

Q. पापमोचिनी एकादशी का क्या महत्व है?
Ans. पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने वाले जातक को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। उसके सभी कष्टों का निवारण होता है।

Q. पापमोचिनी एकादशी पर क्या न करें?
Ans.पापमोचिनी एकादशी के दिन तामसिक भोजन प्याज, लहसुन, मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन ब्रहमचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए।

Q. पापमोचिनी एकादशी व्रत के क्या नियम है?
Ans. पापमोचिनी एकादशी के व्रत को आप दो तरह से रख सकते हैं जिसमें से पहला है निर्जल। इसके तहत उपासक को व्रत के दौरान पानी का सेवन नहीं करना होता है, जिसके चलते इसे सिर्फ स्वस्थ व्यक्तियों को ही रखने की सलाह दी जाती है। दूसरा तरीके में आप दिन में फलाहार का सेवन कर सकते हैं।

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शीतला अष्टमी कब है, जानिए कैसे करनी चाहिए इस दिन शीतला माता की पूजा

हिंदू धर्म में अनेक व्रत त्योहार होते हैं। हर त्योहार का एक विशेष महत्व होता है। 8 मार्च, 2023 से चैत्र मास की शुरूआत हो गई है। चैत्र मास में अनेक व्रत त्योहार पड़ते हैं। इन्ही त्योहारों में एक हैं शीतला अष्टमी का त्योहार। शीतला अष्टमी का त्योहार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इसे बसोडा के नाम से भी जाना जाता हैं। शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला की पूरे विधि विधान से पूजा-पाठ की जाती हैं। मान्यता अनुसार इस दिन माता शीतला को बासी खाने का भोग लगाया जाता है और शीतला माता को भोग लगाने के बाद परिवार के सभी लोग इस खाने को ग्रहण करते हैं। अधिकतर घरों में माता शीतला की पूजा से पहले घर का चूल्हा भी नहीं जलाया जाता है। तो आइए जानते हैं कि वर्ष 2023 में शीतला अष्टमी कब हैं, कैसे इस दिन माता शीतला की पूजा करनी चाहिए। इस लेख में हम आपको ये भी बताएंगे कि बसौड़े वाले दिन बासी भोजन क्यों किया जाता है।

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शीतला अष्टमी कब है | Sheetala Ashtami Kab Hai 2023

जैसा की मैंने ऊपर बताया शीतला अष्टमी या बसोडे का पर्व चैत्र मास की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र मास की अष्टमी तिथि 15 मार्च को सुबह 6 बजकर 39 मिनट से शुरू होकर शाम को 6 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। शीतला अष्टमी की पूजा का शुभ महूर्त सुबह 06 बजकर 20 मिनट से शाम 6 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। इस शुभ महूर्त में ही पूरे विधि विधान के साथ शीतला माता की पूजा करना श्रेयस्कर होगा।

sheetala ashtami kab hai
Sitla Mata Photo

इस तरह करे शीतला माता की पूजा | Sheetala Mata Ki Puja Kaise Kare

माता शीतला को दुर्गा का अवतार मन जाता है। शीतला अष्टमी के एक दिन पहले यानि सप्तमी को माताए और बहने बासी भोजन बना लेती हैं और अष्टमी को माता को भोग लगाती हैं। शीतला अष्टमी के दिन ब्रह्म महूर्त में उठ जाए। नित्य क्रियाओ से निवृत्त होकर स्वच्छ जल से स्नान कर ले। स्नान के पश्चात अपने पूजा घर में जाकर निम्न मंत्र को जपते हुए व्रत का संकल्प ले।

‘मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रव प्रशमन पूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धिये शीतलाष्टमी व्रतं करिष्ये‘

व्रत का संकल्प लेने के बाद शीतला माता के मंदिर में जाकर रोली, चावल, दही, राई, पुष्प आदि शीतला माता को अर्पित करे। सप्तमी के दिन बनाया हुआ बासी भोजन यथा मीठे चावल, पूड़ी, गुड़ के गुलगुले, हल्दी, चने की दाल का शीतला माता को भोग लगाया जाता है। एक तांबे के लोटे में जल लेकर शीतला माता के चरणों में अर्पित करें। कुछ जगहों पर पुरुष भी शीतला माता की करते हैं। पूजा करते समय ‘हृं श्रीं शीतलायै नमः‘ मंत्र का निरंतर उच्चारण करते रहे। माता शीतला को अर्पित किये जाये जल को अपने ऊपर डाले, अपनी दोनों आँखों और गले में लगाए। कुछ जल को बचाकर रख ले। तत्पश्चात शीतला स्तोत्र का पाठ करें और शीतला माता की कथा करे। शीतला माता रोगो को दूर करने वाली माता है। वट वृक्ष में शीतला माता का वास होता हैं , ऐसे में आज के दिन वट वृक्ष की भी पूजा आराधना करनी चाहिए। शीतला मंदिर में पूजा करने के बाद घर लौटते समय कोई हरी चीज बाजार से खरीद ले। जिस स्थान पर होली जली हो उस स्थान पर रोली , चावल , गुलगुले चढ़ाये। अपने घर के मुख्य दरवाजे के दोनों तरफ लोटे का पानी डाले और दीवार पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाये। ततपश्चात घर में प्रवेश करे। घर के सभी लोगों को माता के मंदिर का जल दे , सभी लोग इसे अपनी आँखों और गले में लगाए। थोड़ा जल घर के हर हिस्से में छिड़कना चाहिए। इससे घर की शुद्धि होती है और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है।

इस दिन घर के सभी सदस्यों को बासी भोजन ही करना चाहिए। इस दिन पूजा करने वाली सभी महिलाओं को पूरे दिन ‘वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बरराम्, मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्।‘ मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का अर्थ है मैं पूरी सच्ची श्रद्धा से गर्दभ पर विराजमान, दिगंबरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की वंदना करता/करती हूं। यह मंत्र रोग दूर करने वाला मंत्र हैं , इस मंत्र के जाप से निरोगी काया रहती हैं और व्यक्ति को कोई भी रोग नहीं छू पाता हैं।

शीतला अष्टमी की कथा | Sheetala Mata Ki Katha | Sheetala Ashtmi Story in Hindi

शीतला माता की पूजा को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है , इस कथा के अनुसार एक बार की बात है एक राजा के पुत्र को चेचक (शीतला) निकल गयी। उस राजा के राज्य में एक गरीब किसान का परिवार रहता था , उसके पुत्र को भी शीतला निकली। किसान परिवार ने बीमारी की दौरान किये जाने वाले नियमों को अपनाया। रात दिन माता की पूजा आराधना की, घर में साफ सफाई का विशेष ख्याल रखा। घर में नमक खाने पर पाबंदी थी। न तो किसी सब्जी में छौंक लगता था और न कोई वस्तु भुनी-तली बनाई जाती थी। न किसी गर्म वस्तु का सेवन वह स्वयं करता , न ही शीतला वाले लड़के को देता था। उसके द्वारा किये गए इस उपाय से उसका पुत्र जल्दी ही ठीक हो गया।

इधर जब से राजा के पुत्र को शीतला हुए , उस दिन से उसने भगवती माता की आराधना शुरू कर दी , हर रोज राजा के महल में हवन होता। उसने माता सतचंडी का पाठ शुरू करवा दिया। राजा के राजपुरोहित भी शीतला माता के मंत्रों का निरंतर पाठ करने लगे। राजमहल में रोज तरह-तरह के पकवान बनते , स्वादिष्ट भोजन बनते। इन भोजनो की सुगंध से राजा के पुत्र का इन भोजनों को करने का करता। राजपुत्र की जिद की चलते कोई उसे इन्हे खाने से नहीं रोक सका। चेचक की नियमो को न मानने की चलते उसकी बीमारी बढ़ने लगी , उसके सारे शरीर में बड़े-बड़े फोड़े निकलने लगे। ये देखकर राजा सोच में पड़ गया कि उसने माता की इतनी पूजा की , हवन किया व पाठ किया इसके बावजूद भी उसका पुत्र ठीक होने के बजाये और बीमार क्यों पड़ गया। एक दिन राजा को अपने गुप्तचरों से ज्ञात हुआ कि उसके राज्य के किसान पुत्र को भी शीतला निकली पर वह बिलकुल ठीक हो गया , राजा गहरी सोच में पड़ गया।

एक दिन राजा के गुप्तचरों ने उन्हें बताया कि किसान के पुत्र को भी शीतला निकली थी, पर वह बिलकुल ठीक हो गया है। यह जानकर राजा सोच में पड़ गया कि मैं शीतला की इतनी सेवा कर रहा हूं, पूजा व अनुष्ठान में कोई कमी नहीं, पर मेरा पुत्र अधिक रोगी होता जा रहा है जबकि किसान पुत्र बिना सेवा-पूजा के ही ठीक हो गया। इसी सोच में उसे नींद आ गई। राजा को स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारिणी भगवती ने उसे दर्शन दिया। देवी ने कहा- ‘हे राजन्! मैं तुम्हारी सेवा-अर्चना से बहुत प्रसन्न हूं। इसीलिए ही तुम्हारा पुत्र जीवित है। इसके ठीक न होने का बड़ा कारण है वह यह कि जब तुम्हारे पुत्र को शीतला हुए उस समय तुमने शीतला के समय किये जाने वाले नियमों का उल्लंघन किया। तुम्हें ऐसी हालत में नमक का प्रयोग बंद करना चाहिए। नमक का प्रयोग करने से रोगी के फोड़ों में खुजली होती है। घर की सब्जियों में छौंक नहीं लगाना चाहिए था क्योंकि उन सब्जियों की गंध से रोगी का मन उन वस्तुओं को खाने के लिए ललचाता है। रोगी के आस पास किसी को आने जाने नहीं देना चाइये था क्योंकि यह रोग औरों को भी होने का भय रहता है। अब अगर तुम चाहते हो की तुम्हारा पुत्र ठीक हो गाये तो इन नियमों का पालन करो , तुम्हारा पुत्र अवश्य ही ठीक हो जाएगा।‘ राजा को विधि समझाकर देवी अंतघ्यान हो गईं। अगले दिन से ही राजा ने देवी की आज्ञानुसार सभी कार्यों की व्यवस्था कर दी। इससे राजकुमार की सेहत पर अनुकूल प्रभाव पड़ा और वह शीघ्र ही ठीक हो गया। अत जो भी जातक शीतला अष्टमी के दिन माता को शीतल भोजन का भोग लगता हैं और विधि-विधान से माता का पूजन करता हैं उस जातक का शरीर निरोगी रहता हैं उसके सभी कष्टों का निवारण होता है।

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शीतला अष्टमी का महत्व | Sheetala Ashtami Ka Mahatva

शीतला अष्टमी के दिन जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा भाव से देवी शीतला की आराधना करता हैं, उसकी सभी मनोकामना माता पूरी करती है। व्रत करने वाले जातक की काया निरोगी रहती हैं क्योंकि शीतला माता शीतलता प्रदान करने वाली माता हैं।

स्कंद पुराण में शीतला माता के महत्व के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसके अनुसार शीतला माता गधे पर सवार हैं जो हाथों में कलश, सूप और झाडू पकड़े हैं। माता के गले में नीम के पत्तो की माला हैं।

शीतला माता को बासी भोजन अर्पित किया जाता है जो इस बात का प्रतीक होता है कि आज से ग्रीष्म ऋतु की शुरूआत हो गई है और आज के बाद से ताजा भोजन ही करना है। बासी भोजन भूलकर भी नहीं करना है।

शीतला माता शीतलता प्रदान करने वाली माता हैं। इनके पूजन से जातक के बुखार, चेचक, खसरा आदि रोग दूर हो जाते हैं। व्यक्ति की काया निरोगी रहती है। तो दोस्तो ये थी शीतला अष्टमी या बसोड़े से जुड़ी सारी जानकारी। अगर आपको ये लेख अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों, परिजनों के साथ साझा अवश्य करें। अगर आपको शीतला अष्टमी के विषय में कोई भी जानकारी चाहिए तो कमेंट बाॅक्स में अवश्य लिखे। ऐसे ही धार्मिक और आध्यात्मिक लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाईट से जुड़े रहे। जय श्री राम।

FAQ – ज्यादातर पूछे जाने वाले प्रश्नः

Q. शीतला अष्टमी कब हैं?

Ans. शीतला अष्टमी या बसोड़े का पर्व 15 मार्च, दिन बुधवार को किया जायेगा। इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ शीतला माता की पूजा आराधना करनी चाहिए। शीतला माता सारे मनोरथ को पूरी करने वाली माता है।

Q. शीतला अष्टमी पर किस चीज का भोग लगाया जाता है?

Ans. शीतला अष्टमी पर माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। इस भोजन को सप्तमी के दिन ही बना लिया जाता है।

Q. शीतला अष्टमी की पूजा क्यों की जाती है?

Ans. शीतला अष्टमी के दिन शीतला माता की पूजा करने से चेचक, खसरा, नेत्र विकार आदि बीमारियों से निजात मिलती है। माता की पूजा से गर्मियों में होने वाले सारे रोग दूर हो जाते हैं।

Q. शीतला अष्टमी पर क्या बनाते हैं?

Ans. शीतला अष्टमी की पूजा के लिए अलग-अलग लोग तरह-तरह के भोजन का भोग लगाते हैं। कुछ लोग मीठे चावल, मालपुआ, दही का भोग लगाते हैं, तो कई जगह पर माता को गुड के गुलगुले, चने की दाल, हलुवा का भोग शीतला माता को लगाया जाता है।

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होली क्यों मनाई जाती है | Holi Kyu Manaya Jata Hai

होली स्पेशल: घर की सुख-समृद्धि के लिए होली के दिन जरूर करें ये उपाय

हिन्दू धर्म में होली पर्व एक प्रमुख त्योहार होता है। होली का त्योहार दो दिन मनाया जाता है। एक दिन होली जलाई जाती है जिसे होलिका दहन कहते हैं, दूसरे दिन रंगों वाली होली खेली जाती है जिसे धुलंदी भी कहते है। सभी लोग मिलकर एक दूसरे को रंग, अबीर गुलाल लगाते हैं। एक दूसरे के गले लगते है और बधाईयां देते है। होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होता है। आज के लेख में हम जानेंगे कि वर्ष 2023 में होली का पर्व कब है, इस दिन का क्या महत्व है और होली पर कौन से उपाय करने से जीवन में खुशहाली आयेगी।

होली कब है | Holi Kab Hai | Holika Dahan Kab Hai

इस बार होली पर्व को लेकर असमंजस का वातावरण बना हुआ है। कुछ लोग होलिका दहन 7 मार्च व रंग वाली होली 8 मार्च को बता रहे है तो कुछ 6 मार्च को होलिका दहन और 7 मार्च को रंग वाली होली करने की बात कह रहे है। ऐसे में होली को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है तो आईये हम आपको बताते है कि होलिका दहन और रंग वाली होली किस दिन करना श्रेयस्कर होगा। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 6 मार्च, 2023, दिन सोमवार को सुबह 04 बजकर 17 मिनट से प्रारम्भ होकर 7 मार्च, 2023 दिन मंगलवार को सुबह 6 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। आपको बता दें कि होलिका दहन प्रदोष काल में किया जाता है। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 07 मार्च को शाम 6ः24 से रात 08ः51 तक का है। इस तरह होलिका दहन का कुल समय लगभग 2 घंटा 30 मिनट का है। ऐसे में इन 2 घंटों में ही होलिका दहन करना शुभ होगा। इस समय ही होलिका की पूजा करना और होलिका दहन करना शुभ होगा।

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होलिका दहन वाले दिन यानि 07 मार्च को भद्राकाल भी है। भद्रा काल में होलिका दहन करना अशुभ माना जाता है क्योंकि भद्रा के स्वामी यमराज होते है। भद्रा 7 मार्च को सुबह 05 बजकर 15 मिनट तक है। इस तरह प्रदोष काल के समय होलिका दहन करना उचित होगा क्योंकि उस समय भद्रा का साया नहीं रहेगा। ऐसे में 7 मार्च को ही होलिका दहन करना श्रेयस्कर होगा और 8 मार्च को रंगों वाली होली खेली जायेगी।

Holi Kyu Manaya Jata Hai Hindiji

होलिका दहन पर इस तरह करे पूजा | Holika Dahan Pooja Vidhi | Holi Par Puja Kaise Kare

होलिका दहन वाले दिन प्रदोष काल में जिस जगह पर होलिका एकत्रित हो। वहां जाकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर लें। होलिका में अर्पित की जाने वाली सामग्री जैसे – जल, रोली, अक्षत, फूल, गुड़, साबुत अनाज, गुलाल अपने हाथ में ले ले। कुछ जगह पर गोबर से बने उपलों को भी होलिका में समर्पित किया जाता है। सबसे पहले होलिका की पूजा करें। उसके बाद गुलाल में रंगी मौली, गोबर के उपलों की माला, खिलौनों की माला को होलिका में अर्पित करें। पहली माला पितरों के नाम की होती है, दूसरी हनुमान जी के नाम की, तीसरी शीतला माता की और चैथी माला अपने परिवार के नाम की होती है। इसके बाद होलिका की परिक्रमा करते हुए उसमे कच्चा सूत लपेंटे। आप परिक्रमा अपनी इच्छानुसार 5, 7, 11 बार कर सकते है। होलिका के दोनों तरफ जल अर्पित करें और हाथ जोड़कर अपने परिवार की मंगल कामना की प्रार्थना करें। आज के दिन भगवान नरसिंह की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए।

होलिका दहन के अगले दिन यानि रंग वाली होली के दिन सुबह सवेरे गेहूं की बाली लेकर उसे हल्का सा जला ले। यह कृत्य इस बात का प्रतीक होता कि नये अनाज की पूजा हो गई। होलिका की राख को बहुत पवित्र माना जाता है। इस राख को धुलंडी वाले दिन अपने पूरे शरीर में लगाकर पूजन करना चाहिए। इस दिन पितरों का भी पूजन अवश्य करना चाहिए। अपने सभी पितरों को नमन करे और उनसे प्रार्थना करें कि वह आपके घर-परिवार में सुख-समृद्धि लाएं।

होली क्यों मनाई जाती है | Holi Kyo Manai Jati hai

होली मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है। विष्णु भक्त प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद श्री हरि भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। वह हर समय भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था। इस बात से हिरण्यकश्यप उस पर क्रोधित रहता था। उसने प्रहलाद को तरह-तरह की यातनाएं दी लेकिन भक्त प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति को नहीं छोड़ा। असुर हिरण्यकश्प ने जितने दिन प्रहलाद को कठोर यातनाएं दी। उन दिनों को ही होलाष्टक कहा जाता है। जब हिरण्यकश्प प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति से विमुख करने में नाकामयाब रहा तो उसने यह जिम्मेदारी अपनी बहन होलिका को सौंपी। होलिका को यह वरदान था कि आग उसके शरीर को जला नहीं सकती। होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि मे बैठ गई लेकिन श्री हरि भक्त प्रहलाद के शरीर अग्नि से कोई नुकसान नहीं हुआ जबकि होलिका आग में धूं-धूं कर जल गई। बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई। इस तरह इस दिन से ही सभी लोग सबसे पहले होलिका को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते है और अगले दिन सभी लोग एक दूसरे को रंग-अबीर गुलाल लगाकर एक दूसरे को बधाई और शुभकामनाएं देते है।

होली का महत्व निबंध | Holi Ka Mahatva | Holi Essay in Hindi

हिन्दू धर्म का हर त्योहार धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बहुत महत्व रखता है। हर त्योहार हमें एक सीख और शिक्षा देता है। इसी तरह होलिका दहन भी हमे एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। होलिका दहन हमे यह सीख देता है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होती है। इस दिन हम समाज में फैली बुराईयों को होलिका की अग्नि में जलाकर समाज में अच्छाई का प्रवेश कराते है। ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सम्पूर्ण विधि विधान से होलिका की पूजा करता है उसको स्वस्थ और सुखी जीवन की प्राप्ति होती है। होली के त्योहार को नई ऋतु के आगमन का प्रतीक भी मानते है। इस दिन से वसंत ऋतु का आगमन भी होता है। होली के दिन को तांत्रिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण दिन माना गया है। इस दिन कई लोग तांत्रिक आराधना भी करते है। यही कारण है कि होली के दिन तंत्र-मंत्र से संबंधित बड़े अनुष्ठान किए जाते हैं।

क्यों जलाई जाती है गेहूं की बाली | Holi Par Gehu Ki Bali Ka Kya Karte Hai

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया कि धुलंडी वाले दिन गेहूं की बाली को पवित्र अग्नि में जलाया जाता है लेकिन क्या आप जानते है इसके पीछे का क्या कारण है। गेहूं की बाली को नये अनाज के प्रतीक के रूप में माना जाता है। इस अनाज को होली की पवित्र अग्नि में जलाकर घर में रखने से घर में शुभता का आगमन होता है। होली की अग्नि को भी बहुत पवित्र माना जाता है। इस अग्नि को अपने घर लाकर अपने घर का चूल्हा जलाना चाहिए। कुछ लोग इस अग्नि से अपने घर में अखंड दीपक भी जलाते हैं। इस दीपक को जलाने से घर के सारे कष्ट दूर होते है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस दीपक को हमेशा घर के दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना चाहिए। इस दिशा में दीपक को जलाने से घर से नकारात्मक ऊर्जा जाती है और सकारात्मक ऊर्जा (Positive energy) का प्रवेश होता है।

होली के उपाय | Holi Ke Upay

होली के कुछ उपाय भी है। अगर आप आज के दिन इन उपायों को करते है तो आपको जीवन में सफलता मिलेगी और जिंदगी के हर क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे तो आईये इन उपायों के बारे में जानते हैं।

यदि आपके पास लक्ष्मी जी का ठहराव ना हो यानि लक्ष्मी जी आती तो हो परन्तु शीघ्र ही चली जाती हो तो होली वाले दिन इस टोटके को करे। एक जटा वाला नारियल लेकर उस पर पान व सुपारी चढ़ाएं। इस नारियल को होलिका की पवित्र अग्नि में समर्पित कर दे। तत्पश्चात मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए होलिका की 11 बार परिक्रमा करें। इस उपाय को करने से आपके पास लक्ष्मी जी का स्थाई वास हो जायेगा। होलिका वाले दिन श्री सूक्त और लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने से भी घर में मां लक्ष्मी का आगमन होता है। मां लक्ष्मी के निर्मित हवन करें और उनको केसर मिश्रित खीर का भोग लगाएं। इस खीर को अपने घर-परिवार के सभी सदस्यों में अर्पित करें। खीर का कुछ हिस्सा छोटी कन्याओं में बांटे। ऐसा करने से आपके घर में माता लक्ष्मी का आगमन होगा।

घर से नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए होलिका दहन की राख को अपने घर में लाकर इस राख को अपने घर के चारों कोने में डाल दे। इस राख का कुछ हिस्सा अपने घर के गमलों में भी डाले। इस उपाय को करने से घर से आपके घर की नकारात्मक शक्तियां दूर होगी और घर में सकारात्मक वातावरण का वास होगा।

जैसा कि हमने आपको बताया कि इस बार होलिका दहन 7 मार्च, दिन मंगलवार को किया जायेगा। मंगलवार का दिन हनुमान जी का दिन होता है। ऐसे में आज के दिन रामचरित मानस की चैपाई

“जिमि सरिता सागर मंहु जाही, जद्यपि ताहि कामना नाहीं, तिमि सुख संपत्ति बिनहि बोलाएं, धर्मशील पहिं जहि सुभाएं”

का 108 बार तुलसी की माला से जाप करें। जप करने के बाद हवन करें। इस चैपाई को रोजाना अपनी नियमित पूजा के बाद 11 या 21 बार जपें। इस उपाय को करने से आपके घर में माता लक्ष्मी का वास होगा और घर में सुख-समृद्धि आयेगी।

अगर किसी को कर्जा दे दिया हो , उस कर्जें की वापसी में दिक्कते हो रही हो तो होलिका दहन वाले दिन जिस जगह पर होली जल रही हो उस जगह पर अनार की लकड़ी लेकर उस लकड़ी पर उस आदमी का नाम लिखे जिसे कर्जा दिया हो। उस लकड़ी पर हरा गुलाल छिड़कर उसे होलिका की अग्नि में अर्पित करें। आप देखेंगे कि जल्द ही आपको आपका धन वापस मिल जायेगा।

अगर व्यापार में नुकसान हो रहा हो, निरन्तर घाटा ही घाटा हो रहा हो तो व्यापार में घाटे को खत्म करने और अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए होली वाले दिन एक पीला कपड़ा ले लें। इस कपड़े में हल्दी, 11 गोमती चक्र को बांध दे। एक चांदी का सिक्का लेकर उसे काले कपड़े में बांध दे। इसके बाद ‘ऊँ महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का जाप करते हुए इस कपड़े को होली की पवित्र अग्नि में अर्पित कर दे। आप देखेंगे कि शीघ्र ही आपके व्यापार का नुकसान कम हो जायेगा और बिजनेस में वृद्धि होने लगेगी।

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उत्तम स्वास्थ्य के लिए | Health Tips on Holi

घर से बीमारी को दूर करने और स्वस्थ शरीर की प्राप्ति के लिए होलिका दहन वाले दिन परिवार के सभी सदस्य अपने सिर से लेकर पैर तक पूरा नापकर उसके बराबर कच्चा सूत लेकर होलिका में अर्पित करें। सुबह होलिका की राख को अपने घर लाकर पुरूष सदस्य पूरे शरीर पर और महिला सदस्य अपने गले में लगाएं। इस उपाय को करने से परिवार के सभी सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक बना रहेगा और बीमारी का घर में नामोनिशान नहीं रहेगा।

अगर आपके बच्चे का पढ़ाई में मन ना लग रहा हो तो अपने बच्चों के हाथों से पान, नारियल और सुपारी को जिस जगह पर होलिका दहन हो रहा हो वहां पर गरीब लोगों को दान दें। इस उपाय को करने से आपके बच्चे का पढ़ाई में मन लगने लगेगा और वह परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होगा।

अगर आप बेरोजगार है, कई प्रयासों को करने के बाद भी मनचाही नौकरी न मिल रही हो तो होलिका दहन वाले दिन नींबू लेकर उसे अपने ऊपर से 21 बार उतारकर उसे होली की अग्नि में अर्पित कर दे। इस उपाय को करने के बाद होलिका की 11 बार परिक्रमा करें। इस उपाय को करने से आपको अतिशीघ्र नौकरी मिल जायेगी। यदि पहले से कोई नौकरी कर रहे हो तो उसमें पदोन्नति के योग भी बनेंगे।

होलिका वाले दिन गणपति जी की वंदना करना भी बहुत श्रेष्ठकारी होता है। सात कौड़िया व एक शंख लें। इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके तुलसी की माला से ऊँ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करें। इस सामग्री को किसी सुनसान स्थान पर किसी गड्ढ़े में डालकर दबा दें। इस उपाय को करने से आपके जीवन में खुशहाली आयेगी।

घर के वास्तु दोष को ठीक करने के लिए होलिका दहन वाले दिन अपने इष्टदेव का पूजन करें। पूजन के बाद उन्हें गुलाल अर्पित करें। इस उपाय को करने से आपके घर का वास्तुदोष खत्म होगा व घर में सुख शांति का वास होगा।

भूलकर भी ना करें इन चीजों का दान | Holi Par Na Kare Ye Kam

होलिका दहन के दिन दान पुण्य का बहुत महत्व होता है लेकिन ज्यादातर लोग बिना सोचे समझे किसी भी चीज का दान कर देते है। तो आईये हम आपको बताते है कि इस दिन किन चीजों का दान करने से बचना चाहिए।

धुलंडी वाले दिन लोग जिन कपड़ों से होली खेलते है, बाद में उन कपड़ों को किसी गरीब को दान कर देते हैं। भूलकर भी ऐसा ना करें क्योंकि ऐसे कपड़ों का दान करने से आपके घर की खुशहाली चली जायेगी।

लोहे या स्टील के बर्तनों का भी दान होली पर नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से आपको आर्थिक नुकसान होगा। अगर आप दान करना ही चाहते है तो किसी गरीब कन्या को सोने की वस्तु दान कर सकते हैं।

होली वाले दिन भूलकर भी किसी को पैसों का दान नहीं करना चाहिए। पैसों का दान करने से आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है।

सफेद वस्तु शुक्र ग्रह का प्रतीक होती है। ऐसे में अगर होली वाले दिन आप सफेद वस्तु का दान करते हैं तो आपको शुक्र ग्रह की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

मान्यता अनुसार सरसो के तेल का दान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है लेकिन होली वाले दिन भूलकर भी किसी को तेल का दान नहीं करना चाहिए क्योंकि होलिका दहन पूर्णिमा को होता है।

होली वाले दिन किसी को गिफ्ट में कांच की या उससे बनी वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए।

निष्कर्ष

होली का पर्व बुराई पर अच्छाई के प्रतीक का पर्व माना जाता है। होलिका दहन की अग्नि में बुराई रूपी असुर को जलाया जाता है और अच्छाई रूपी देवता की आराधना की जाती है। होलिका की अग्नि में सभी नकारात्मक शक्तियों का दहन किया जाता है। होली पर रंग गुलाल खेलने की परंपरा भी होती है। तो दोस्तों आज के लेख में हमने आपको हिन्दूओं के प्रमुख त्योहार होली विषयक आपको सारी जानकारी प्रदान की। उम्मीद करते है हमारे पिछले लेखों की तरह यह लेख भी आपको उत्तम लगा होगा। इस लेख को अपने परिजनों व मित्रों के साथ सोशल मीडिया पर साझा जरूर करें। इसी तरह के धार्मिक व आध्यात्मिक लेखों को पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे।

जयश्रीराम

FAQ : ज्यादातर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.1. होली 2023 में कब है?

Ans. होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। वर्ष 2023 में होलिका दहन 7 मार्च को है व रंग वाली होली यानि धुलंडी का पर्व 8 मार्च का मनाया जायेगा।

Q.2. होली से क्या बदलाव होता है?

Ans. होली को वसंत ऋतु के आगमन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। होली के त्योहार से गर्मी शुरू होने लगती है।

होली वाले दिन क्या करते है.

रंग वाली होली के दिन सभी लोग आपस के बैरभाव भुलाकर एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते है। छोटे अपने बड़ो के पैर छूकर उनका आर्शीवाद लेते है। बच्चे, बड़े सभी लोग होली की मस्ती में मदहोश रहते है।

Q.3. होलिका दहन वाले दिन किस भगवान की पूजा होती है?

Ans. होलिका दहन वाले होलिका और भक्त प्रह्लाद की पूजा की जाती है। जो भी व्यक्ति होलिका की पूजा करे उसे होलिका की पूजा के पश्चात होलिका के पास बैठकर भगवान नरसिंह की पूजा भी करनी चाहिए।

Q.4. होली वाले दिन क्या न करें?

Ans. कुछ लोग होली के दिन मदिरा का सेवन कर लेते है। होली खुशहाली का पर्व है लेकिन लोग शराब, मदिरा का सेवन कर लड़ाई-झगड़ा करते है। एक दूसरे को अपशब्द कहते है। भूलकर भी इस दिन शराब का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे घर की खुशहाली चली जाती है।

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